Wednesday, March 9, 2011

आइना ए छत्तीसगढ़

एक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में, कोई देर से जाने वाला
उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला


कांगे्रस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह नहीं रहें। अविभाजित मध्यप्रदेश में 3 बार मुख्यमंत्री, पंजाब के राज्यपाल और केन्द्रीय मंत्री रह चुके अर्जुन सिंह को कांगे्रस के संविधान में परिवर्तन करके राष्टï्रीय उपाध्यक्ष भी बनाया गया था। छत्तीसगढ़ के सच्चे हितैषी तो वे थे साथ ही पंजाब में राज्यपाल बनकर राजीव-लोगोंवाल समझौता कराना उनकी कार्यकुशलता का एक उदाहरण है। बतौर संचार मंत्री उन्होंने आम आदमी तक 'टेलीफोनÓ पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छत्तीसगढ़ के खरसिया से विधानसभा उपचुनाव और दिल्ली में लोकसभा उपचुनाव जीतकर उन्होंने अपनी लोकप्रियता ही साबित की थी। राजीव की हत्या के बाद उनकी नरसिंह राव से नहीं जमी इसीलिये उन्होंने कांगे्रस छोड़कर एन डी तिवारी के नेतृत्व में बनी तिवारी कांगे्रस में चले गये पर उनके राजनीतिक चेलों से उस वक्तउनका साथ छोड़ दिया। 1996 में वे लोस चुनाव हार गये फिर कांगे्रस वापसी के बाद 98 का लोस चुनाव भी होशंगाबाद से हार गये। 2000 में मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिये चुने गये। 2004 में यूपीए की सरकार में मावन संसाधन मंत्री बने और उच्च शिक्षण संस्थाओं पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के आरक्षण का ऐतिहासिक फैसला क्रियान्वित कराया था। वैसे जीवन के अंतिम काल में वे जरूर अलग-थलग पड़ गये। उन्हें सबसे अधिक नुकसान तब हुआ जब उनके जीवन पर लिखी पुस्तक में उनकी पत्नी के हवाले से कथित तौर पर कहा गया कि कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अर्जुन सिंह को देश का राष्टï्रपति-प्रधानमंत्री नहीं बनाकर गलती की।
वहीं दिसंबर 1984 में भोपाल में युनियन कार्बाइड से जहरीली गैस रिसाव में लाखों लोगों के प्रभावित होने पर भी अमेरिका के मुख्य आरोपी एंडसन की रिहाई में प्रदेश सरकार की मदद का आरोप था। 11 अगस्त 2010 को उन्होंने राज्यसभा में कहा था कि एंडसन को छोडऩे के लिए केन्द्रीय गृहमंत्रालय का दबाव था तब नरसिंह राव गृहमंत्री थे। पर उन्होंने गांधी-नेहरु परिवार पर आंच तो नहीं आने दी पर यह कहकर भी चौंका दिया कि गैस-त्रासदी और एंडसन की गिरफ्तारी की जानकारी तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दी थी पर उन्होंने चुप्पी साध ली थी। गृहमंत्रलाय पर किसका दबाव था यह राज ही रह गया।
छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक मंत्री बनाये थे
छत्त्ीसगढ़ के सच्चे हितैषी, अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री, पूर्व केन्द्रीय मंत्री, पंजाब के पूर्व राज्यपाल तथा कांगे्रस के राष्टï्रीय उपाध्यक्ष अर्जुन सिंह चल बसे और उनके निधन के बाद छत्तीसगढ़ कांगे्रस के कई दिग्गज नेताओं के राजनीतिक गुरु, मार्गदर्शक भी चले गये। छत्तीसगढ़ में शहीद वीरनारायण सिंह, पं. सुंदरलाल शर्मा को उन्होंने लगातार स्मरण कर स्थापित किया तो बिलासपुर में गुरुघासीदास विश्वविद्यालय की स्थापना से लेकर उसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने में भी उनकी अहम भूमिका रही है।
कभी श्यामाचरण शुक्ल मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह को श्यामाचरण शुक्ल को कांगे्रस से निकाले जाने के बाद की राजनीति में घर जाने का बेहतर मौका मिला। 1980 के विस चुनाव में कांगे्रस को अच्छी सफलता के बाद अर्जुन सिंह स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री के दावेदार हो गये थे उस समय तो विद्याचरण शुक्ल ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए शिवभानु सिंह सोलंकी को सामने कर दिया। हालांकि वे सफल नहीं हो सके। मुख्यमंत्री बनने के बाद अर्जुन सिंह ने 'शुक्ल बंधुओंÓ की राजनीतिक पकड़ को तोडऩे की कोशिश शुरू की। शुक्ल बंधुओं को 'बाहरीÓ स्थापित करने के लिये स्थानीय ब्राह्मïण नेतृत्व को उभारा। पवन दीवान को कांगे्रस में प्रवेश कराया। पंं. सुंदरलाल शर्मा को इतिहास से निकालकर महिमा मंडित किया। सोनाखान में वीरनारायण सिंह की शहादत की याद की गई और उनकी स्मृति में सोनाखान में स्मारक बनाया गया तो सर्किट हाऊस (अब राजभवन) के सामने चौराहे का नामकरण भी वीरनाराण सिंह के नाम किया गया।
अर्जुन सिंह के इन प्रयासों से शुक्ल बंधुओं को कितना राजनीतिक नुकसान हुआ यह तो नहीं आंका जा सकता है पर अर्जुन सिंह गुट के रूप में छत्तीसगढ़ में एक नया कांगे्रसी संगठन तैयार हो गया इसमें कई शुक्ल समर्थक नेता भी शामिल हो गये थे। अर्जुन सिंह भी समझते थे कि छत्तीसगढ़ में शुक्ल बंधुओं के गढ़ को ढहाना आसान नहीं है इसलिये उन्होंने झुमुकलाल भेडिय़ा, वेदराम, भंवरसिंह पोर्ते जैसे आदिवासी नेताओं को प्रोत्साहित किया वहीं मनकूराम सोढ़ी, गंगा पोटाई आदि को आगे बढ़ाते हुए अपनी जमीन छत्तीसगढ़ में तैयार की। उन्होंने सतनामी समाज के गुुरु विजय कुमार को अपने मंत्रिमंडल में शामिल भी किया। इसका उन्हें दोहरा लाभ हुआ वे आदिवासी और सतनामी समाज के मसीहा के रूप में पहचान पाने लगे अर्जुन सिंह के मंत्रिमंडल में पहली बार छत्तीसगढ़ से 6 कबीना मंत्री बनाए गये जिसमें 5 हरिजन आदिवासी थे। इसके अलावा 7 राज्यमंत्री एवं उपमंत्री बनाये गये यानि छत्तीसगढ़ के 13 लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। छत्तीसगढ़ में पहली बार मंत्रिमंडल में इतने लोगों का प्रतिनिधित्व मिला था।
पं. रविशंकर शुक्ल के मुख्यमंत्रित्व काल में नरेश सिंह, रानी पदमावती, गणेशराम अनंत कबीना मंत्री तो मथुराप्रसाद दुबे, केशव लाल गुमाश्ता, वीरेंद्र बहादुर सिंह उपमंत्री के रूप में शामिल रहे थे। वही कैलाश नाथ काटनू मंत्रिमंडल में केवल वीरेंद्र बहादुर सिंह को छोड़कर सभी को शामिल किया गया। वहीं भगवंत राव मंडलोई मंत्रिमंडल में केवल 3 मंत्री छत्तीसगढ़ में राजा नरेश सिंह, केशवलाल गुमाश्ता और मथुरा प्रसाद दुबे शामिल रहे। पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र मंत्रिमंडल में नरेश चंद, गणेशराम अनंत और पदमावती देवी कबीना और डॉ. रामचरण राय, रामेश्वर शर्मा, वेदराम ही शामिल थे। बाद में जरुर पुर्नगठन में नरेश चंद्र, वेदराम, किशोरीलाल शुक्ल, पं.श्यामाचरण शुक्ल को कबीना तथा रामगोपाल तिवारी, टुमन लाल को राज्यमंत्री तथा राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को संसदीय सचिव बनाया गया था। वहीं गोविंदनारायण सिंह के मंत्रिमंडल 7 कबीना मंत्री डॉ. रामचंद्र राय,रामेश्वर प्रसाद शर्मा, बृजलाल वर्मा, वीरेंद्र बहादुर सिंह, धर्मपाल गुप्ता, भानुप्रताप सिंह, गणेशराम अनंत शामिल थे तो शारदा चरण तिवारी, बद्रीनाथ बघेल राज्यमंत्री एवं दृगपाल शाह, पे्रम सिंह उपमंत्री के रूप में शामिल थे। बाद में पुर्नगठन में छत्तीसगढ़ के 6 कबीना, 3 राज्यमंत्री तथा एक उपमंत्री को जगह दी गई।
वहीं 13 मार्च 69 से 25 मार्च 69 तक राजा नरेश सिंह के मंत्रिमंडल में केवल 2 कबीना मंत्री बृजलाल वर्मा, दृगपाल शाह को स्थान दिया गया। बाद में पंडित श्यामाचरण शुक्ल मंत्रिमंडल में वेदराम, महंत बिसाहूदास, गणेशराम अनंत कबीना, भोपालराव पवार, झुमुकलाल भेडिय़ा, प्यारेलाल कंवर, चित्रकांत जायसवाल को राज्यमंत्री, देसवाय मरावी को उपमंत्री बनाया गया था। प्रकाश सेठी मंत्रिमंडल में भी 4 मंत्री किशोरी लाल शुमन, बिसाहू दास महंत, रमनलाल, झुमुकलाल भेडिय़ा तथा कमलादेवी सिंह संसदीय सचिव बनी थी बाद में पुनर्गटन में 9 मंत्री तथा 3 संसदीय सचिव बनाये गये थे। इसके बाद श्यामाचरण शुक्ल पुन: मुख्यमंत्री बने तो मथुरा प्रसाद दुबे, श्रीधर मिश्र, कबीना, रामचंद सिंह देव प्यारेलाल कंवर राज्यमंत्री तथा किशन लाल कुर्रे, बवानी लाल वर्मा संसदीय सचिव बनाये गये थे। इसके बाद कैलाश जोशी, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुंदरलाल पटवा म.प्र. के मुख्यमंत्री बने।
9 फरवरी 1980 को जब अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने तो पहले दौर में वेदराम, झुमुकलाल भेडिय़ा, डा. दुमनलाल को कबीना मंत्री तथा भंवर सिंह पोर्ते से मनकूराम सोढ़ी, डा. कन्हैयालाल शर्मा को राज्यमंत्री बनाया। 1981 में पुनगर्ठन में कबीना मंत्री के रूप में 6 , राज्य मंत्री के रूप में 5, उपमंत्री के रूप में 2 तथा एक संसदीय सचिव यानि 14 छत्तीसगढ़ के लोगों को शामिल किया गया था। जिसमें वेदराम, झुमुकलाल भेडिय़ा, डा दुमनलाल, भवर सिंह पोर्ते, मनकूराम सोढ़ी, डा. कन्हैयालाल शर्मा कबीना मंत्री, राज्यमंत्री के रूप में भवानी लाल वर्मा, मोती लाल वोरा, बी.आर.यादव, बंशीलाल धृतलहरे, श्रीमति कमला देवी, उपमंत्री के रूप में मकसूदन लाल चंद्राकर, जीवनलाल साहू और संसदीय सचिव के रूप में गंगा पोटाई को स्थान दिया गया था। वहीं 1983 में पुनगर्ठन में 19 लोगों को शामिल किया गया था। बाद में मोतीलाल वोरा जब मुख्यमंत्री बने तो छत्तीसगढ़ के मंत्रियों की संख्या 14 से घटकर 8 हो गई। मोतीलाल वोरा के मंत्रिमंडल में कबीना मंत्री के रूप में डा. कन्हैयालाल शर्मा, बी.आर.यादव, बंशीलाल धृतलहरे, कमला देवी सिंह, गंगा पोटाई तो राज्य मंत्री के रूप में चित्रकांत जायसवाल हरिप्रसाद शर्मा और रणवीर सिंह शास्त्री को शामिल किया गया था। बाद में श्यामाचरम शुक्ल 1 दिसंबर 89 से एक मार्च 90 तक मुख्यमंत्री बने तो उनके कैबिनेट में 6 कबीना, 4 राज्यमंत्री तथा 3 उपमंत्री जरूर बनाये गये थे। हां दिग्विजय सिंह मंत्रिमंडल में जरूर छत्तीसगढ़ को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मंत्रिमंडल में मिला। उनके मंत्रिमंडल में 28 दिसंबर 95 के पुनर्गठन के बाद कबीना मंत्री तथा 7 राज्यमंत्री बनाये गये थे। कबीना मंत्रियों में राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, बी.आर. यादव, अशोक राव, चरणदास महंत, शिव नेताम, डा. प्रेमसाय सिंह, धनेस पाटिला, जागेश्वर साहू, बिसाहू लाल सिंह तथा राज्यमंत्री के रूप में नंदकुमार पटेल, डेरहू प्रसाद धृतलहरे, चनेशराम राठिया, सत्यनारायण शर्मा, जालम सिंह पटेल, रविन्द्र चौबे, माधव सिंह ध्रुव शामिल थे।
छत्तीसगढ़ विकास प्राधिकरण!
हालांकि अर्जुनसिंह के राजनीतिक चेले दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में ही पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ और सौभाग्य से अर्जुन सिंह के दूसरे चेले अजीत जोगी नये राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने. आईएएस की नौकरी से कांग्रेस की राजनीति में अजीत जोगी को लाने का श्रेय वैसे अर्जुन सिंह को ही जाता है कहा जाता है कि उन्होंने ही अजीत जोगी को रायपुर में कलेक्टर की कमान सम्हालने भेजा था बहरहाल मोतीलाल वोरा के मुख्यमंत्रित्व काल में अजीत जोगी ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर सीधे राज्यसभा की सदस्यता हासिल की। खैर अर्जुन सिंह ने भी पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को उस समय समझा था तथा महत्व भी दिया था। छत्तीसगढ़ की उपेक्षा और दर्द को समझकर उन्होंने पहली बार छत्तीसगढ़ से आजादी के बाद मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया था वहीं उन्होंने छत्तीसगढ़ विकास प्राधिकरण की भी स्थापना की थी। जिसका मुख्यालय रायपुर था। इस प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मंत्रिमंडल में शामिल जुमुकलाल भेडिय़ा को दी गई थी। प्राधिकरण के अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री थे। वहीं प्राधिकरण के सचिव के रूप में तत्कालीन संभाग कमिश्नर शेखर दत्त को मनोनीत किया था। शेखर दत्त इन दिनों छत्तीसगढ़ राज्य के राज्यपाल है। खैर छत्तीसगढ़ विकास प्राधिकरण ने क्या किया, बाद में यह प्राधिकरण भंग हो गया, क्यों भंग किया गया तह तो नहीं कहा जा सकता पर यह तो तय है कि अर्जुन सिंह को छत्तीसगढिय़ों की चिंता थी इसीलिए उन्होंने छत्तीसगढ़ के समग्र विकास के लिए प्राधिकरण का भी गठन किया था।
और अब बस
1985 में विधानसभा चुनाव में सफलता के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ अर्जुन सिंह ने ली और दूसरे दिन ही पंजाब के राज्यपाल नियुक्त हो गये। एक पुलिस अधिकारी के अंतरंग संस्मरण (परित्राणाय साधुनाम) पुस्तक में डॉ. आर एल एस यादव ने लिखा है कि राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह से वादा किया था कि वे केवल 6 माह के लिए पंजाब चले जाएं। वहां शांति स्थापित कर लोकप्रिय सरकार बनाने के लिये चुनाव कराना है। चुनाव समाप्त होते ही उन्हें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में वापस आने की छूट होगी। उनसे यह भी कहा गया था कि अपने उत्तराधिकारी के रूप में वे जिस विधायक को चाहे मुख्यमंत्री मनोनीत कर सकते हैं। क्या कारण था! क्या परिस्थितियां थी! जिसके कारण अर्जुन सिंह ने मोतीलाल वोरा को अपना उत्तराधिकारी चुना! यह तो ज्ञात नहीं है परंतु इस निर्णय से वे अपने जीवन के बाद के वर्षों में पछताते अवश्य पाये गये।

1 comment:

  1. पांडे जी ,लेख पढ़ कर कई नयी जानकारी मिली| छत्तीसगढ़ की राजनीति पर यह खोजपरक लेख है| धन्यवाद !

    ReplyDelete