Sunday, December 26, 2010


अपना चेहरा न बदला गया,
आइने से खफा हो गये,
बेवफा तो न वो थे न हम
यूं हुआ बस जुदा हो गये

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह निश्चित ही भाग्य के धनी है तभी तो नगरपालिका में एक पार्षद से सार्वजनिक जीवन की राजनीति शुरू करने के बाद विधायक, सांसद होकर केन्द्र में मंत्री बन गये थे और छत्तीसगढ़ राज्य में एक पूरा कार्यकाल समाप्त कर दूसरी बार मुख्यमंत्री बनकर एक रिकार्ड बनाने अग्रसर हैं। उनके साथ सबसे अच्छी बात तो यह है कि उनकी छवि अच्छे राजनेता की है। वहीं विवादों से दूर रहने के अलावा उनमें एक अच्छा गुण यह है कि वे कम से कम बात करते हैं। वहीं राजनीति में 'बदले की भावनाÓ से कार्य करना उनकी आदत नहीं है जैसा अक्सर राजनेताओं में देखा जाता है। बहरहाल राजनीतिक पार्टी में अदने से कार्यकर्ता के रूप में शामिल होकर उन्होंने मुख्यमंत्री तक का सफर पूरा किया है। यह एक उदाहरण दें सकता है। वैसे उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा को राजनांदगांव लोकसभा में पराजित किया था और उसी के फलस्वरूप उन्हें केन्द्र में मंत्री बनाया गया था। 2003 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहले विधानसभा चुनाव में उन्हें मंत्री पद छोड़कर छत्तीसगढ़ जैसे तत्कालीन कांगे्रस के गढ़ में सरकार बनाने की बात सपना देखने जैसी थी पर यह चुनौती उन्होंने स्वीकार की और उसी चुनौती में सफल होने के कारण वे लगातार दूसरी बार भी मुख्यमंत्री बने हैं। वैसे डॉ. रमन सिंह के साथ एक बात अच्छी है कि उन्हें उनकी ही पार्टी से चुनौती खुलकर नहीं मिल रही है। छत्तीसगढ़ के पितृ पुरुष लखीराम अग्रवाल के पुत्र अमर अग्रवाल को मंत्रिमंडल से बाहर कर फिर वापसी से उन्होंने अपने पार्टी विरोधियों को यह तो समझाने में सफल रहे कि वे कड़े निर्णय लेने में भी पीछे नहीं हैं। उनके पहले कार्यकाल में उनके विरोध में आदिवासी एक्सप्रेस चली थी पर उसमें शामिल बड़े नेता आजकल प्रदेश की राजनीति से ही बाहर है। उस समय तो यह कहा जाता था कि तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने प्रदेश के 'सिंहÓ को बचा लिया पर उनके हटते ही नीतिन गडकरी भाजपा अध्यक्ष बने और सुषमा स्वराज लोस में नेता प्रतिपक्ष बनी तब प्रदेश में बड़े फेरबदल की उम्मीद असंतुष्टï नेता कर रहे थे पर जिस तरह सार्वजनिक मंचों सहित पार्टी फोरम में भाजपा के बड़े नेताओं ने डॉ. रमन सिंह की पीठ थपथपाई उससे कइयों के मंसूबों में पानी फेर दिया है।
क्यों जुदा हो गये?
बहरहाल प्रदेश के कद्दावर भाजपा नेता रमेश बैस और डॉ. रमन सिंह के बीच संबंध अच्छे नहीं हैं यह जगजाहिर है। एक भाजपा के नेता का कहना है कि दोनों में कई समानताएं हैं फिर भी दोनों की विचारधारा क्यों नहीं मिलती है यह समझ से परे हैं। दोनों का नाम 'रÓ से रमेश बैस, रमन सिंह हैं दोनों ने पार्षद का चुनाव जीतकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया है, दोनों पहले विधायक बने, बैस पहले विधायक मंदिर हसौद से बने थे तो डॉ. रमन सिंह कवर्धा से चुने गये थे। दोनों सांसद रह चुके हैं, दोनों केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो चुके हैं। दोनों ने पूर्व मुख्यमंत्री को हटाया है। डॉ. रमन सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा को पराजित किया था तो रमेश बैस ने पं. श्यामाचरण शुक्ल को पराजित किया था। एक बात दोनों में और भी कामन है दोनों 'डेरी हत्थाÓ है यानी बांये हाथ से लिखते हैं। वैसे दोनों में एक असमानता यह है कि रमेश बैस का पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी से याराना है तो डॉ. रमन सिं का 36का आंकड़ा है। डॉ. रमन सिंह के पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल से काफी अच्छे संबंध है तो रमेश बैस से उनका 36 का आंकड़ा है।
कांगे्रस की अपनी लड़ाई!
छत्तीसगढ़ में भाजपा के फलने-फूलने का बहुत बड़ा कारण 'कांगे्रसÓ ही है। देश की सबसे 125 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी कांगे्रस की हालत छत्तीसगढ़ में किसी से छिपी नहीं है। यहां के बड़े कांगे्रसी नेताओं की उच्च महत्वाकांक्षा तथा अहं की लड़ाई के कारण कांगे्रस दिनों दिन रसातल में मिलती जा रही है। कभी छत्तीसगढ़ से विजयी कांगे्रस के विधायकों की संख्या के आधार पर अविभाजित मध्यप्रदेश में कांगे्रस की सरकार बनती थी पर अब इसी छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की हालत पर तरस ही आ रहा है। वैसे छत्तीसगढ़ में कांगे्रस के कुछ नेता देश में जाने-पहचाने जाते हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, अजीत जोगी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तथा वर्तमान में कांगे्रस के राष्टï्रीय सचिव मोतीलाल वोरा भी एक बड़ा नाम है। आदिवासी नेता तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविंद नेताम, अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व गृहमंत्री, सांसद डॉ. चरण दास महंत, मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में लम्बे समय तक गृहमंत्री रहे नंदकुमार पटेल, नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे, सत्यनारायण शर्मा, धनेंद्र साहू सभी बड़े नाम है। कांगे्रस के संगठन तथा सत्ता में कभी बड़ा दखल रखने वाले स्वरूपचंद जैने भी जाना पहचाना नाम है। कांगे्रस में कुछ और बड़े और जाने पहचाने नाम है पर उन्हें वह तवज्जो नहीं दी जा रही है। वहीं हाल-फिलहाल किसी नेता का पिछलग्गू बनकर संगठन में पद हासिल करने वालों की तूती बोल रही है और यही लोग टिकट वितरण करते हैं और चुनाव परिणाम साबित भी करता है कि टिकट वितरण में भेदभाव हुआ था। बहरहाल देश की सबसे पुरानी कांगे्रस पार्टी में बड़े नेताओं में एका नहीं है।धनेंद्र साहू जैसे अध्यक्ष से किसी बड़े नेता के खिलाफ कार्यवाही की उम्मीद करना बेकार है। अनुशासनहीनता और भीतरघात आम बात है। कभी नारायण सामी जैसे केन्द्रीय मंत्री पर कांगे्रस भवन में कालिख पोती जाती है तो कभी तिरंगा केक काटकर जगहंसाई का पात्र बनने में कोई कोताही नहीं बरती जाती है। भिलाई नगर निगम तथा बीरगांव नगर पालिका के चुनाव में टिकट वितरण को लेकर जिस तरह बड़े नेताओं के मतभेद सामने आये वह किसी से छिपा नहीं है। ऐन भिलाई नगर निगम के चुनाव के समय नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे पर जिस तरह पार्टी के विधायक बदरुद्दीन कुरैशी ने गंभीर आरोप लगाये, शपथ पत्र दिया वह मामला कांगे्रस हाईकमान को प्रेषित हो चुका है। बस्तर जहां कभी कांगे्रस का गढ़ था वहां 'सलवा जुडूमÓ अभियान को लेकर आज भी कांग्रेस की एक राय नहीं बन सकी है जबकि अब तो 'सलवाजुडूमÓ की मौत होने को है। कांग्रेस प्रदेश के विपक्ष की भूमिका कैसे निभा रही है यह भी सर्वविदित है। भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लग रहा है पर विपक्ष चुप है। वरिष्ठï आईएएस अफसर बीएल अग्रवाल के ठिकानों पर छापे के बाद उनका निलंबन बहाली और हाल ही में राजस्व मंडल का अध्यक्ष बनाने पर विपक्ष चुप है। पाठ्यपुस्तक निगम की पाठ्य पुस्तकें कबाड़ी के गोदाम से जप्त की जाती है, पापुनि के महाप्रबंधक निर्धारित अवधि (3 साल) पूरा का भी प्रतिनियुक्ति पर है, लाखों रुपये मासिक पर किराये में भवन लिया गया है, महापुरुषों की वितरित होने वाली पोटो में सरदार वल्लभभाई पटेल शामिल नहीं है, इंदिरा, राजीव शामिल नहीं है पर विपक्ष चुप है। प्रदेश के गृहमंत्री और डीजीपी के बीच 36 का आंकड़ा है , नक्सली अपहरण करते हैं और परिजन हैदराबाद जाकर छोडऩे की अपील करते है पर विपक्ष चुप है। नई राजधानी रायपुर में निर्माण कार्यो पर भ्रष्टï्राचार का बोलबाला है, धान खरीदी हो या सालबीज खरीदी का मामला हो विपक्ष चुप है क्यों?
डीएम की वापसी !
छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय में एक अफसर थे दुर्गेश माधव अवस्थी। रायपुर जिले के आईजी सहित आईजी गुप्त वार्ता के पद पर भी कार्यरत थे। प्रदेश के कुछ मंत्रियों सहित विपक्ष के कुछ नेताओं ने उनकी लगातार शिकायत की। इसी बीच 75 सीआरपीएफ के जवानों की नक्सलियों द्वारा सामूहिक हत्या के मामले में उन्होंने अपने एक कनिष्ठï अधिकारी को बली का बकरा बनाने का प्रयास किया, सरकार ने भी ऐसा ही पक्ष रखा पर बस्तर प्रवास पर गये गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। चिदंबरम की नाराजगी के चलते ही डा. रमन सिंह को कड़ा निर्णय लेकर डीएम अवस्थी को पुलिस मुख्यालय से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा वहीं आईजी (गुप्तवार्ता) पर मुकेश गुप्ता को तैनात करना पड़ा । इधर हाल ही में डीेम अवस्थी को अब आईजी से एडीशनल डीजी पदोन्नत करने की चर्चा है। सूत्रों का कहना है कि 'सरकारÓ के निर्देश पर ही डीपीसी आयोजित की गई थी। बहरहाल डीएम अवस्थी को पुन: पुलिस मुख्यालय लाने की चर्चा है वैसे चर्चा यह भी है कि उन्हें वर्तमान पद को पदोन्नत कर पुलिस मुख्यालय से बाहर ही रखने के लिए भी कुछ मंत्री और वरिष्ठï अफसर सरकार पर दबाव बनाये हुए हैं।वैसे लोग कहते है कि अब आरोप लगाने के बाद आईएएस बाबू लाल अग्रवाल पदोन्नत हो सकते है तो कई तरह के विवादों से चर्चित डीएम अवस्थी वापस मुख्यालय क्यों नहीं आ सकते।
और अब बस
(1)
बिहार के एक नेता के 'प्रसादÓ के नाम पर पुलिस के एक आला अफसर को हटाने में सरकार असमंजस में है वैसे तो मंत्रालय स्तर पर उन्हें हटाने नोटशीट भी चल चुकी है।
(2)
उत्तर प्रदेश के एक बड़े नेता का सरकार पर फिर दबाव है कि उनके समर्थक अफसर को फिर अच्छा पद दिया जाए पर सरकार के कुछ मंत्रियों का इससे नाराज होने का खतरा बढ़ गया है।
(3)
जाय उम्मेन के बाद या नारायण सिंह या सुनील कुमार...यह चर्चा मंत्रालय में जमकर है कुछ तो दुखी है पर बहुत से अफसर परिवर्तन की वकालत भी कर रहे हैं।
(4)
छ.ग. टेनिस एसोसिएशन को स्थायी सदस्य की मान्यता दिलाने में विक्रम सिंह सिसोदिया की अहम भूमिका रही। एक टिप्पणी..सरकार को कई क्षेत्रों में मान्यता दिलाने का जिम्मा अब अमनसिंह के पास है इसलिए विक्रम सिंह अब खेलकूद में व्यस्त हैं?

Monday, December 13, 2010

आइना ए छत्तीसगढ़

दामन है तार-तार मुझे कुछ पता नहीं

कब आ गई बहार मुझे कुछ पता नहीं

दिल क्यों है बेकरार मुझे कुछ पता नहीं

किस का है इंतजार मुझे कुछ पता नहीं


छत्तीसगढ़ के 10 साल पूरे हो चुके हैं। भाजपा की सरकार बनाकर अपना 7 साल का बतौर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पूरा कर रिकार्ड बना चुके हैं। लगातार 5 साल तक मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा करने के बाद दूसरा कार्यकाल का भी 2 साल पूरा करने वाले डॉ. रमन सिंह देश के भाजपा मुख्यमंत्रियों में अब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद दूसरे नंबर पर जगह बना चुके हैं। हालांकि पूर्व उपराष्टï्रपति स्व. भैरोसिंह शेखावत 3 बार मुख्यमंत्री बन चुके थे पर उन्हें कभी भी 5 साल तक मुख्यमंत्री रहने का सौभाग्य नहीं मिला था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने हाल ही में अपना पांच साल पूरा किया है पर उनके लिये उन्हें 2 पारी खेलनी पड़ी है। 2003 के विधानसभा में करीब 3 साल तथा 2008 की विधानसभा के बाद उन्हें 2 साल बतौर मुख्यमंत्री काम करने का अवसर मिला है। डॉ.रमन सिंह का पहला पांच-पांच साल समझने में ही लगा पर दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके आसपास के लाग ही कहते हैं कि अब वे पहले के डॉ. रमन सिंह नहीं रहे वे अब मुख्यमंत्री बन चुके हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी कार्यप्रणाली तथा भले आदमी की छवि का लाभ पार्टी को भी मिल रहा है। उनके बारे में यही कहा जाता है कि नौकरशाही के चलते काम रुक जरूर जाते हैं पर डॉ. रमन सिंह किसी के खिलाफ बदले की भावना से काम नहीं करते हैं जैसा कि आम राजनीतिज्ञों की आदत होती है। बहरहाल डॉ. रमन सिंह ने अपने सात साल बतौर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में पूरे कर लिये हैं। पर अफसरों पर सवारी करने पर सफल नहीं हो सके हैं। आज भी प्रदेश में नौकरशाही भारी साबित हो रही है। सबसे बड़ी विडंबना तो यही है कि मुख्यमंत्री के आसपास ही रहने वाले अफसर मुख्यमंत्री को आम जनता से दूर ही कर रहे हैं। डाक्टर साहब के निर्देश का भी ये अफसर पालन करने में रुचि नहीं लेते हैं। असल में सीएम हाऊस सहित सचिवालय में पदस्थ अफसर जनता और सीएम के बीच पुल का काम करना चाहिये पर ऐसा होता नहीं है। यह भी तो नहीं देखा जा रहा है कि मुख्यमंत्री के निर्देशों का 'फालोअपÓ हो रहा है या नहीं। वैसे डॉ. रमन सिंह के पास अमन सिंह, विक्रम सिंह सिसोदिया के बाद एक और 'सिंहÓ सुबोध सिंह भी पहुंच गये हैं पर तीनों 'सिंहोंÓ में एका कई बार नहीं है यह स्पष्टï हो चुका है। सीएम सचिवालय में एक निजी सचिव ओ पी गुप्ता भी है उसके बारे में तो कुछ मंत्री, सांसद सहित अफसर भी शिकायत कर चुके हैं कि वह तो ऐसे निर्देश फोन पर देता है मानों वहीं मुख्यमंत्री हो?

गुटबाजी और अहं की लड़ाई !

छत्तीसगढ़ 10 साल पूरे कर चुका है और ग्यारहवें साल की तरफ अग्रसर है पर प्रदेश में आपसी गुटबाजी और अहं की लड़ाई भी अनवरत जारी है। भारतीय जनता पार्टी की सत्तासीन सरकार की बात हो या प्रमुख विपक्षी दल कांगे्रस की बात हो या अफसरों की चर्चा करें खुलकर या लुकाछिपी में शह और मात का खेल जारी है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उन्हीं की नाम राशि वाले रमेश बैस के बीच 36 का आंकड़ा किसी से छिपा नहीं है। शुक्ल बंधुओं को पराजित कर प्रदेश के सबसे वरिष्ठï सांसद बैस को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने से किसने रोका यह सर्वविदित है। डॉ. रमन सिंह मंत्रिमंडल के वरिष्ठï सदस्य बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत के बीच भी 36 का आंकड़ा है। कमल विहार को लेकर दोनों के बीच कडु़वाहट तो मंत्रिमंडल की बैठक में सार्वजनिक हो चुका है। कृषिमंत्री चंद्रशेखर साहू तथा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के बीच भी 36 का आंकड़ा है। खेल मंत्री लता उसेंडी और पूर्व मंत्री रेणुकासिंह के बीच भी जमकर ठनी है। मुख्यमंत्री सचिवालय को संविदा नियुक्ति में पदस्थ अमन सिंह और ओएसडी विक्रम सिंह सिसोदिया के संबंध भी अच्छे नहीं रहे हैं। गृहमंत्री ननकीराम कंवर और डीजीपी विश्वरंजन के बीच तो भारी कटुता है। जहां तक विश्वरंजन का सवाल है तो छत्तीसगढ़ के अधिकांश मंत्री उनके व्यवहार और कार्यप्रणाली से असंतुष्टï हैं। वहीं उनके समकक्ष 2 डीजी संतकुमार पासवान और अनिल एम नवानी से उनके संबंध मधुर नहीं है। आर्थिक अपराध शाखा के आईजी डी एम अवस्थी के तो अधिकांश मंत्रियों सहित आईएएस, आईपीएस अफसरों से संबंध ठीक नहीं हैं। उन्हें अभी एडीजी पदोन्नति की चर्चा ही है और लोग उनके मुख्यालय में नहीं आने के लिए प्रयास तेज कर चुके हैं।
राजधानी की महापौर किरणमयी नायक और निगम कमिश्नर ओपी चौधरी के बीच तो 36 का आंकड़ा है वहीं महापौर सभापति के बीच भी मधुर संबंध नहीं है इसका खामियाजा रायपुर की जनता भुगत रही है वैसे अब महापौर का संबंध अपनी ही पार्टी के प्रमुख नेताओं से भी अच्छे नहीं रह गये हैं। कभी उन्हें अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल, डॉ. चरणदास महंत, सत्यनारायण शर्मा का करीबी माना जाता था पर आजकल महापौर ने ही उनसे दूरियां बढ़ा ली है ऐसा कांगे्रसी ही कहते हैं।
कांगे्रस पार्टी में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और विद्याचरण शुक्ल में 36 का आंकड़ा था। पिछले विधानसभा चुनाव में अरूण वोरा को दत्तक पुत्र बताने वाले जोगी से आजकल मोतीलाल वोरा फिर दूर हो गये हैं। डॉ. चरणदास महंत तो हाल ही में नगरीय निकाय चुनाव की बैठक में अजीत जोगी से 'हमने आपको नहीं बुलाया थाÓ यह कहकर अपनी कडुवाहट सार्वजनिक कर चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे अभी भी जोगी खेमे के विधायकों के आज भी विधानसभा में नेता नहीं मानेे जाते हैं। हाल ही में तो विधायक बदरूद्दीन कुरैशी ने उन पर आर्थिक अनियमितता के गंभीर आरोप लगाकर शपथ पत्र में शिकायत कर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वैसे डॉ. रमन सिंह ने रविन्द्र चौबे के मधुर संबंधों की चर्चा अब तो आम कांगे्रसी भी करने लगा है।

तिरंगा केक

कभी छत्तीसगढ़ से जीतने वाले कांगे्रसी विधायकों की संख्या के आधार पर ही अविभाजित मध्यप्रदेश में सरकार बनती थी उसी छत्तीसगढ़ में पृथक राज्य बनने के बाद कांगे्रस की स्थिति दिनोंदिन सोचनीय होती जा रही है वहीं भाजपा फलती-फूलती जा रही है। कांगे्रस की हालत यह है कि वह विधानसभा हो या आम जनता के बीच कहीं भी भाजपा पर निशाना लगाने में सफल नहीं हो पा रही है। भाजपा की सरकार बनने के बाद विपक्षी दल कांगे्रस के पास कई मुद्दे हैं। भ्रष्टïाचार, प्रदेश के खनिज संसाधनों का अत्याधिक दोहन, स्वास्थ्य समस्या, केन्द्र के पैसों का दुरुपयोग, कानून व्यवस्था, कई मुद्दे हैं पर विपक्ष उसे दमदार तरीके से उठाने में न जाने क्यों असफल ही साबित हो रहा है। दरअसल कांगे्रस को अपनों से ही लडऩे से फुर्रसत नहीं मिल रही है। वहीं आये दिन कांगे्रस, सत्ताधारी दल को नये-नये मुद्दे परोस रही है।
देश की सबसे पुरानी कांगे्रस पार्टी में आखिर छत्तीसगढ़ में हो क्या रहा है। कभी इन्हीं की पार्टी के कुछ लोग केन्द्रीय मंत्री तथा प्रदेश प्रभारी नारायण सामी पर कालिख फेंकते हैं और संगठन में काबिज नेता 'एक बड़े नेताÓ की शिकायत आलाकमान से करता है। महापौर किरणमयी नायक सामान्य सभा के बहिष्कार की चेतावनी देती हैं और उसके बाद प्रदेश अध्यक्ष का पत्र आ जाता है कि सामान्य सभा में शामिल हों। कांगे्रस के पार्षद निर्दलीय पार्षद के पक्ष में मतदान करते हैं? अधिक संख्या में कांगे्रस के पार्षद बनने के बाद भी निगम में भाजपा का सभापति बन जाता है?
खैर हाल ही में सोनिया गांधी के जन्मदिन पर 'तिरंगा केकÓ भी अब जमकर चर्चा में है। इस विषय में तो अब कांगे्रस के महासचिव (पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मोतीलाल वोरा के कार्यकाल के) सुभाष शर्मा और जिला कांगे्रस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल के खिलाफ पुलिस ने राष्टï्रीय ध्वज का अपमान के मामले में जुर्म कायम कर लिया है। यह गैर जमानती मामला है अब भले ही सुभाष शर्मा कहें कि मैंने तो केवल केक काटा है किसने बनाया था मुझे पता नहीं है। धाड़ीवाल कह रहे हैं कि केक का रंग तिरंगे से अलग था बीच में चक्र में डंडिया कम थी। बहरलाल यह बताना भी जरूरी है कि धाड़ीवाल तो पेशें से वकील हैं और सुभाष शर्मा ने भी एलएलबी किया है फिर सुंदरनगर गृहनिर्माण सोसायटी के बतौर संस्थापक रहकर उन्होंने इतनी अधिक लड़ाई कोर्ट में लड़ी है कि उन्हें देश के कानून का अच्छा ज्ञान प्राप्त हो गया है। वैसे पुलिस दोनों नेताओं के अलावा उस कार्यक्रम में उपस्थित अन्य नेताओं, केक बनाने आदेश देने वाले व्यक्ति, केक बनाने वाले बेकरी मालिक पर भी कार्यवाहीं करने के मूड में हैं।

और अब बस
(1)

खेलमंत्री लता उसेंडी कहती हैं कि हमारी सरकार ने खेल बजट में 40 गुना वृद्घि कर दी है। भाजपा सरकार में 'बजटÓ बढऩे पर ही तो खेलने का मौका मिल रहा है इसीलिए तो कई कांगे्रसी दुखी हैं।

(2)

छत्तीसगढ़ के एक अफसर की पत्नी को 40 हजार रुपए मासिक मिल रहा है उनका काम ग्रामीणों को शौचालय जाने प्रेरित करना ही है।

(3)

कभी संगठन प्रभारी रहे एक बड़े भाजपा नेता की पत्नी के एनजीओ को प्रदेश सरकार ने एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें बच्चों की सेहत का जिम्मा सौंपा गया है।

Thursday, December 9, 2010

आइना ए छत्तीसगढ़

हमारी बेबसी यह है कि हम कुछ नहीं कहते हैं

वफा बदनाम होती है अगर फरियाद करते हैं


भारतीय जनता पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के पुत्र के विवाह में छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं ने भी शिरकत की, आखिर उनकी पार्टी के प्रमुख के घर पर कोई शुभ अवसर हो तो जाना तो पड़ेगा ही। फिर पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद ही उन्होंने पहले छत्तीसगढ़ प्रवास पर ही यह कहकर कई मंत्रियों, संसदीय सचिवों और विधायकों की नींद उड़ा दी कि पिछला चुनाव में 10 हजार से कम मतों से जीतने वालों के लिए खतरे की घंटी है। यानी भाजपा के विधायकों को यदि पिछला चुनाव 10 हजार से कम मतों से जीता है तो उन्हें पुन: टिकट मिलेगी यह कोई जरूरी नहीं है। नीतिन गडकरी ने यह किस संदर्भ में कहां यह तो पता नहीं है पर कइयों की नींद उन्होंने जरूर उड़ा दी है।
नीतिन गडकरी के हिसाब से तो छत्तीसगढ़ सरकार के 8 मंत्री सहित 4 संसदीय सचिव खतरे में है। छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह मंत्रिमंडल के वनमंत्री विक्रम उसेंडी मात्र 109 मतों से विजयी रहे हैं तो जल संसाधन मंत्री हेमचंद यादव 702 कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू 1490 मतों से ही अपनी जीत दर्ज की थी। इसके अलावा छत्तीसगढ़ को अपने बयानों के लिये चर्चित पंचायत मंत्री रामविचार नेताम (4210) गृहमंत्री ननकीराम कंवर (8321) स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल (9376) उद्योगमंत्री दयालदास बघेल (6507) महिला एवं बाल विकास मंत्री लता उसेंडी (2771) ही विजयी रहे हैं। संसदीय सचिवों में विजय बघेल (7842) भइया लाल राजवाड़े (5546) ओमप्रकाश राठिया (3367) और भरत साय (9592) भी विजयी रहे हैं। मंत्रियों और संसदीय सचिवों को मिलाकर भाजपा के कुछ 28 विधायक ऐसे हैं जो 10 हजार से कम मतों से पिछला चुनाव जीतकर सदन में पहुंचे हैं। विधानसभा अध्यक्ष धर्मलाल कौशिक (6070) विस उपाध्यक्ष नारायण चंदेल (1190) डॉ. सुभाऊ कश्यप (1201) नंदकुमार साहू (2979) आदि भी इसी श्रेणी में हैं।
खैर बात शुरू हुई थी भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के नागपुर में पुत्र के विवाह के अवसर पर जाहिर है कि मंत्री विधायक तो शुभ अवसर पर नागपुर गये ही थे वहीं पार्टी के कुछ बड़े पदाधिकारी भी वहां पहुंचे थे। वैसे मंत्री विधायक तो पहुंचे ही साथ ही पिछली बार विधानसभा चुनाव में पराजित होने वाले पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडे, पूर्व पंचायत मंत्री मंत्री अजय चंद्राकर आदि भी वहां पहुंचेना नहीं भूले। वैसे गडकरी के बेटे की शादी में भव्य आयोजन देखकर एक पूर्व मंत्री ने दिलचस्प टिप्पणी कर दी। हम तो चुनाव लड़कर लाखों खर्च करते हैं पर नीतिन जी ने तो एक भी चुनाव नहीं लड़ा है। चलो, इसी भव्य आयोजन में उन्होंने अच्छा खासा खर्च कर दिया है।

कानून व्यवस्था पर चिंतित डॉ. रमन सिंह

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के हाल ही में पुलिस अधिकारियों की कानून व्यवस्था की स्थिति पर समीक्षा बैठक में तेवर देखकर कई लोगों के हाथ-पांव फूल गये हैं। केवल चापलूसी तथा राजनीतिक सेटिंग के चलते फील्ड में कमान हासिल करने वालों को मुख्यमंत्री की चेतावनी खतरे की घंटी ही लग रही है। दरअसल आदिवासी अंचल बस्तर तो नक्सली वारदातों से सहमा हुआ है। आपरेशन ग्रीन हण्ट के बाद नक्सली भिलाई, दुर्ग, बारनवापारा के जंगल, सरायपाली, बागबाहरा में उड़ीसा की सीमा से लगे गांवों में सक्रिय होने प्रयासरत हैं तो रायगढ़ के गोमार्डा अभ्यारण्य, बिलासपुर के अचानकमार क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाने प्रयासरत हैं। उदंती अभ्यारण्य, सीतानदी क्षेत्र में तो उनकी सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। बस्तर में कानून व्यवस्था की स्थिति तो ठीक है ही नहीं। वहीं अब राजधानी रायपुर, औद्योगिक नगरी भिलाई-दुर्ग, न्यायधानी बिलासपुर, अम्बिकापुर में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती जा रही है। हाल ही में बच्चों के अपहरण, उनकी हत्या से भी मुख्यमंत्री कम आहत नहीं है। उन्होंने पुलिस मुख्यालय में आईजी, एसपी की बैठक में 2-3 माह में स्थिति पर नियंत्रण पाने नहीं तो कार्यवाही की एक तरह से चेतावनी दे दी है। इधर सूत्रों की मानें तो हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत का रिकार्ड बनाने वाले नीतिश कुमार का मानना है कि बिहार में 'कानून व्यवस्थाÓ की स्थिति में सुधार उनकी जीत का प्रमुख कारण है। लगता है कि डॉ. रमन सिंह ने उन्हीं से प्रेरणा लेकर प्रदेश की कानून व्यवस्था ठीक-ठाक करने का मन बनाया है। वैसे भी बस्तर की 11 विधानसभ सीटों में 10 पर भाजपा का कब्जा है, वहां सलवा जुडूम दम तोड़ा रहा है, कानून के दायरे में आने के कारण वहां चाहकर भी सरकार कुछ करने की स्थिति में नहीं है, सलवा जुडूम के कारण शिविरार्थी का अब क्या होगा। यह सरकार के लिये चिंता का विषय है। इधर प्रमुख शहरों में कानून व्यवस्था की हालत से सरकार का चिंतित होना लाजिमी है। विपक्ष को एक अच्छा मौका मिल रहा है। दरअसल मुख्यमंत्री ने गृहमंत्री के साथ एक बार पहले भी पुलिस मुख्यालय का दौरा करके 'गुटबाजीÓ खत्म करने कहा था पर हालत जस की तस है। वैसे लगता है कि यदि एक दो माह के भीतर स्थिति संतोषप्रद नहीं दिखाई देती है तो पुलिस मुख्यालय से जिला स्तर पर एक बड़ा फेरबदल हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

गृहमंत्री वी/एस डीजीपी

छत्तीसगढ़ जैसे नक्सली प्रभावित जिले में प्रदेश के सबसे पुराने और अनुभवी आदिवासी नेता तथा गृहमंत्री ननकीराम कंवर और डीजीपी विश्वरंजन के बीच शुरू से ही पटरी नहीं बैठ रही है। जबकि दोनों के बीच जनरेशन गेप भी नहीं है। गृहमंत्री सीधे-सादे हैं लाग लपेट से दूर हैं। अनुभवी हैं, तो डीजीपी भी अनुभवी हैं, कवि हृदय है साहित्यकार हैं, पर वे कुछ चापलूस किस्म के लोगों से घिर गये हैं। वे कब छुट्टïी पर जाते हैं कहां जाते हैं इसकी जानकारी भी गृहमंत्री को नहीं रहती है। कभी गृहमंत्री के निर्देशों पर अवहेलना की चर्चा होती है तो कभी उनके निर्देशों पर तबादला नहीं करने का मसला उठता है, कभी उन्हें बुलेटप्रुफ कार नहीं देने की बात उठती है। पर हाल ही में एचएम स्क्वाड को लेकर चर्चा गर्म है। गृहमंत्रालय के अनुरोध पत्र को गृहमंत्री ने खारिज कर दिया था। पर स्पेशल स्क्वॉड मुख्यमंत्री के कहने पर ही भंग कर दिया है। उन्होंने तो यह भी आपत्ति की है कि स्पेशल स्क्वॉड का नाम एचएम स्क्वॉड किसने रखा है। यह भी ठीक नहीं है। अब सवाल यह उठ रहा है कि एचएम स्क्वॉड का गठन किसने किया था, उसे भंग करने या नहीं करने का अधिकार किसको है। यदि गृहमंत्रालय के स्तर पर स्क्वॉड गठित किया गया था तो उसके लिये बल, वाहन आदि तो डीजीपी साहब ने ही उपलब्ध कराया होगा। उस समय उन्होंने क्यों मना नहीं किया था? यदि जिला पुलिस बल की कार्यप्रणाली से डीजीपी संतुष्टï हैं तो लगभग सभी बड़े जिलों में क्राइम स्क्वॉड के गठन की क्यों जरूरत पड़ी?
दरअसल यह पूरा झगड़ा गृहमंत्री और डीजीपी के अहं का अब बन चुका है। डीजीपी द्वारा प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान (सरकार से विधिवत अनुमति ली गई है या नहीं पता नहीं)
के गठन, राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक रहे विनोद चौबे की नक्सलियों द्वारा हत्या, डीजीपी उस समय संस्थान के कार्यक्रम में व्यस्त रहने पर गृहमंत्री ननकीराम कंवर द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करने के बाद से दूरियां और बढ़ गई है। गृहमंत्री के नोटिस का हालांकि अभी डीजीपी की तरफ से जवाब नहीं आया है पर गृहमंत्री और डीजीपी के बीच की बढ़ती दूरियों से प्रदेश के अफसर भी अलग-अलग लामबंद होना शुरू हो गये हैं। कुल मिलाकर डा. रमनसिंह को मध्यस्थता का कोई बड़ा रास्ता मिकालना होगा। वैसे यह भी चर्चा है कि पुलिस अधिकारियों की जिला स्तर पर पदस्थापना मुख्यमंत्री के आसपास रहने वाले कुछ नौकरशाहों की पसंद-नापसंद पर आजकल अधिक निर्भर कर रहा है तभी तो बिलासपुर संभाग में एक प्रभारी मंत्री की इच्छा के विरूद्ध एक बड़े पुलिस अफसर की पदस्थापना की गई है।

अधिक पुस्तकें छपी तो कैसे?

बच्चों को मुफ्त बांटी जाने वाली पाठ्यपुस्तकें कबाड़ी के गोदाम में रद्दी के भाव में बेची गई आनन-फानन में पापुनि के महाप्रबंधक सुभाष मिश्रा सक्रिय हो गये, स्कूल प्रबंधन को दोषी ठहरा दिया। स्कूली शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने नाराजगी जाहिर की, अनाधिकृत बिक्री करने वालों के खिलाफ कार्यवाही के निर्देश दिये तथा वितरण से बची पुस्तकें पापुनि को लौटाने के भी निर्देश दिये। स्कूली शिक्षा विभाग में नये नये प्रमुख सचिव बने एम.के. राऊत ने भी आवश्यक निर्देश दिये। उन्होंने आगामी शिक्षा सत्र में छात्रों की वास्तविक संख्या के आधार पर ही पुस्तकें उपलब्ध कराने का भी भरोसा दिलाया। अब कुछ सवाल उठ रहे हैं कि वास्तविक छात्र संख्या से अधिक पुस्तकें प्रकाशित करने दोषी कौन है, स्कूलों में डाक से पापुनि ने पाठ्यपुस्तकें भेजी थी जाहिर है कि स्कूलों में मांग के अनुसार ही पुस्तकें भेजी गई होगी तो अधिक पुस्तकें कैसे पहुंची, फिर पुस्तकें यदि रद्दीवाले के गोदाम में पहुंची तो उस शाला के छात्रों को पुस्तकें उपलब्ध नहीं कराई गई है, यदि उन्हें पुस्तकें नहीं मिली तो बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा। पापुनि के महाप्रबंधक सुभाष मिश्र स्कूल प्रबंधक पर लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं तो एक स्कूल के पास 10 लाख की पुस्तकें कहां से पहुंची। वैसे पापुनि की स्थिति तो तभी साफ हो सकती है जब वह पिछले 3-4 साल में कागज की खरीदी और प्रकाशित पुस्तकों की संख्या सार्वजनिक करें। यही नहीं पिछले 3-4 सालों में दर्ज छात्र संख्या भी सार्वजनिक करना जरूरी है। वैसे 40 हजार महीने के किराये के मकान पर चल रहे कार्यालय को करीब 2 लाख मासिक के किराये पर लेने की क्या जरूरत थी यह भी स्पष्टï करना जरूरी है पापुनि के पूूर्व अध्यक्ष इकबाल अहमद रिजवी तो पापुनि के पिछले 5 साल के जमा खर्च की स्पेशल आडिट किसी विशेषज्ञ से कराने का अनुरोध भी शालेय शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल से कर रहे हैं।

और अब बस

(1) छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अफसर को मलाईदार पद जाने का अफसोस है। यदि बिहार में नई सरकार के शपथग्रहण तक फेरबदल नहीं होता तो उनका मलाईदार पद नहीं जाता।

(2)

डा. रमन सिंह ने पुलिस मुख्यालय जाकर अफसरों की जमकर क्लास ली। इससे हाल ही में पुलिस मुख्यालय से हटाये गये एक अफसर काफी खुश है।

Wednesday, December 1, 2010

छत्तीसगढ़ आईना
दोस्तों की बेनियाजी देखकर
दुश्मनों की बेरुखी अच्छी लगी
आ गया अब जूझना हालात से
वक्त की पेचीदगी, अच्छी लगी
छत्तीसगढ़ के तत्कालीन गृहमंत्री रामविचार नेताम ने विधानसभा में बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ शुरू 'सलवा जुडूम के लोकयुद्घÓ में लालआंधी के रूप में चर्चित नक्सलियों से टकराने की जुर्रत कर अपना घर बार छोड़कर सुरक्षा कैम्प में रहने वाले ग्रामीण आदिवासियों को 'शिविरार्थीÓ की जगह 'शरणार्थीÓ कह दिया था और कांगे्रस ने खूम हंगामा मचाया था। अब 'शरणार्थीÓ शब्द का प्रयोग नेताम ने जानबूझकर किया था या उनके मुंह से निकल गया था यह तो वहीं बता सकते हैं पर अब जमीनी हकीकत यह है कि सलवा जुडूम के योद्घा हों या सुरक्षा शिविर में रहने वाले ग्रामीण हों अब शरणार्थी की हालत में ही पहुंच चुके हैं।
निर्वासन, विस्थापन या परायेपन का एहसास क्या होता है इसका सही जवाब तो सलवा जुडूम शिविर में किसी तरह जीवन गुजारने वाले ग्रामीण आदिवासी ही दे सकते हैं। बस्तरवासी कुछ आदिवासियों ने तीर-धनुष, टंगियानुमाहथियार, लकड़ी के ल_ï लेकर ए. के. -47 जैसे संगीन एवं आधुनिक हथियार लेकर घूमने वाले नक्सलियों से दो-दो हाथ करने का पक्का इरादा किया था और इसमें उन्हें उन्हीं की माटी में जन्मे आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा ने पूरा सहयोग करने का यकीन दिलाया था। यहीं नहीं छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया डॉ.रमन सिंह ने भी उनके साथ हमेशा खड़े रहने का भरोसा दिलाया था। पहले तो उन्हें सुरक्षा शिविरों में ठहराया गया, उनके रहने भोजन सहित सुरक्षा की भी व्यवस्था की गई, नक्सलियों के खिलाफ स्वास्र्फूत आंदोलन सलवा जुडूम के कारण नक्सलियों की हिटलिस्ट में आये कई गांवों के करीब 45 हजार ग्रामीण अपना घर-बार, पुरखों की डेहरी, गाय तथा अन्य जानवर छोड़कर सरकार द्वारा मुख्य सड़क के करीब बनाये गये राहत शिविरों में भी रहने राजी हो गये। राज्य सरकार ने भी 45 हजार लोगों के रहने सहित भोजन आदि की व्यवस्था भी सरकार करती थी। गांव छोड़कर राहत शिविरों पर रहने आने के पीछे यहीं मजबूरी थी कि गांव में रहने पर नक्सली आकर मार सकते थे। राहत शिविर में पहले तो सुरक्षाबल को सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई पर धीरे-धीरे विशेष पुलिस अधिकारी ही राहत शिविर के मुखिया बन गये और उनका आतंक बरपने लगा। ग्रामीणों के सामने यही मजबूरी थी कि गांव तो लूट चुके हैं, बरबाद हो चुका है, नक्सलियों का भय बना हुआ था पर शिविरों में सुरक्षा बल सहित विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) का अत्याचार बढ़ता जा रहा था फिर नक्सलियों के भी कुछ राहत शिविरों में हमला करके अपना आतंक बरपाना शुरू कर दिया। बाद में तो कई ग्रामीण आदिवासी राहत शिविर छोड़कर पास के प्रदेश मसलन उड़ीसा-आंधप्रदेश में शरण लेने मजबूर हो गये। अब तो राहत शिविरों में गिनती के ही ग्रामीण बचे हैं।
हाल ही में सरकार ने भी सलवा जुडूम शिविरों में आर्थिक मदद में हाथ खींच लिया है। सूत्रों की मानें तो सरकार ने सलवा जुडूम को आर्थिक मदद नहीं करने का निर्णय ले लिया है। हालांकि इसकी अधिकृत पुष्टिï नहीं हो सकी है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बस्तर के स्कूल, आश्रमों सहित कुछ अन्य सार्वजनिक भवनों से सुरक्षाबल को हटाने के आदेश भी मुख्य सचिव ने दे दिए हैं।
सबसे बड़ी चर्चा तो यह है कि सलवा जुडूम आंदोलन के नाम पर देश-विदेश में चर्चा में आये नेताओं ने 'आपरेशन ्रग्रीनहण्टÓ चालू करने पर सलवा जुडूम समर्थको से न तो चर्चा करना जरूरी समझा न ही उन्हें आपरेशन ग्रीनहण्ट का हिस्सा बनने ही दिया। अब हालत यह है कि बस्तर का 'सलवा जुडूमÓ दम तोड़ रहा है। सरकार ने तो हाथ खींच लिया ही है।
वहीं नेता प्रतिपक्ष तथा कभी बस्तर टाईगर के नाम से चर्चित महेंद्र कर्मा भी विधानसभा चुनाव पराजय के बाद कुछ कम सक्रिय हैं हाल ही में एक नया संगठन बनाना और उसकी बैठक में कर्मा का शामिल होना भी चर्चा में है। हालत यह है कि सलवा जुडूम समर्थक ग्रामीण तथा राहत शिविर में रह रहे लोग अपने गांव वापस नहीं हो सकते क्योंकि वहां तो कुछ बचा ही नहीं है। खेत बंजर हो चुके हैं, पुरखों की डेहरी, छोटी-मोटी झोपड़ी, पुराना कुछ झोपडिय़ों का गांव वीरान हो चुका है, मवेशी बचे नहीं है नक्सलियों का डर अभी भी बरकरार है और राहत शिविरों की व्यवस्था भी बिगड़ चुकी है। सरकार के हाथ खींचने से अब वहां की हालत दयनीय हो चुकी है। कभी राहत शिविरों में मुख्यमंत्री राज्यपाल सहित बड़े आला अफसर आते थे पर अब तो वहां वीरानी है। हाल ही में प्रशासनिक मुखिया जाय उम्मेन सहित कई विभागों में प्रमुख सचिव, सचिव आदि जगदलपुर बस्तर विकास की एक जरूरी बैठक में शामिल होने पहुंचे थे पर किसी ने भी राहत शिविर जाने में रुचि नहीं ली। नई सरकार बनने के बाद गृहमंत्री या कोई अन्य मंत्री या डीजीपी विश्वरंजन एक-दो बैठक में आये या किसी नक्सली वारदात के बाद ही आये पर राहत शिविर की तरफ किसी ने रुख नहीं किया, वहां की व्यवस्था नहीं देखी। राहत शिविर में रहने वालों के लिये पक्के मकान बनाने की घोषणा केवल सपना ही साबित हुई, राहत शिविरवासियों को रोजगार मूलक प्रशिक्षण देने की योजना का हश्र क्या हुआ यह राहत शिविर में जाकर देखा जा सकता है। कुल मिलाकर अपने ही देश-प्रदेश तथा क्षेत्र में सलवा जुडूम से जुड़े लोग शरणार्थियों सा जीवन अब नहीं जी पा रहे हैं।
कब तक होते रहेंगे प्रयोग!
लगभग 30 सालों से माओवादी दहशत से साल के वनों से आच्छांदित, सुदर छटा के लिये चर्चित बस्तर में अब कदम-कदम पर आतंक अपने पांव पसारे बैठा है। किस कदम पर मौत का सामना हो जाए कोई नहीं जानता है। हालत तो अब यह हो गई है कि लोग बस्तर में न अपनी बेटी देना चाहते हैं और न ही वहां से बहु लाना चाहते हैं। हालत यह है कि बस्तर में सामान्य परिवार के कई लोग राजधानी के आसपास अपना ठिकाना बना चुके हैं। बस्तर में भाजपा सरकार 'काबिजÓ होने के बाद निश्चित ही नक्सली वारदातों में वृद्घि परिलक्षित हुई है। पहले विदेश से लौटने के पश्चात ओपी राठौर को सीधे डीजीपी बना दिया गया और उनकी ही देखरेख में 'सलवा जुडूमÓ आंदोलन पला, बढ़ा फिर बस्तर के आदिवासी युवकों (कम उम्र के बच्चों) को भी विशेष पुलिस अधिकारी बनाकर उन्हें बिना प्रशिक्षण या लायसेंसों के बंदुक देकर नक्सलियों के उन्मूलन का प्रयोग चला, एसपीओ पर फिर कई तरह के आरोप भी लगे। ओ पी राठौर के कार्यकाल में ही पंजाब में आतंकवाद के खात्मे में कारगार भूमिका निभाने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी के पी एस गिल को सरकार का सलाहकार नियुक्त किया गया। उन्होंने कुछ सुझाव भी दिये पर उन्हें पूरे अधिकार सौंपे नहीं गये और बाद में सलाहकार पद से हटने के बाद उन्होंने पुलिस सहित सरकार की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े किये। ओ पी राठौर की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात केन्द में आईबी (इंटेलीजेन्स ब्यूरो) में लम्बे समय तक कार्य करने वाले विश्वरंजन को मनाकर छत्तीसगढ़ लाकर डीजीपी का प्रभार सौंपा गया। इनके कार्यकाल में तो कई रिकार्ड बने। फील्ड का अनुभव लम्बे समय तक नहीं होना भी उनके कार्यकाल पर अंगुली उठाता है, फिर उनके गृहमंत्री से छत्तीस के संबंध भी चर्चा में है। एक साथ 75 सीआरपीएफ के जवानों की शहादत, पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे की नक्सलियों द्वारा हत्या, बस्तर में नक्सलियों द्वारा सबसे बड़ी बारुद लूट ने भी रिकार्ड बनाया। वैसे बृजमोहन अग्रवाल को हटाकर आदिवासी वर्ग से पहले रामविचार नेताम फिर ननकीराम कंवर को गृहमंत्री बनाना भी नया प्रयोग था। विश्वरंजन के कार्यकाल में पुलिस अफसरों के बीच गुटबाजी की भी चर्चा अक्सर सुनाई देती है। वैसे अभी तक प्रदेश को नक्सली प्रभावित क्षेत्र मानकर ही पहले राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय (पूर्व पुलिस महानिदेशक बिहार) के एम सेठ (पूर्व सैन्य अधिकारी), ईएसएल नरसिम्हन (पूर्व आईबी प्रमुख), को राज्यपाल बनाया और अभी शेखर दत्त (पूर्व आईएएस अधिकारी तथा रायपुर-बस्तर संभाग में कमिश्नर का दायित्व सम्हाल चुके) को पदस्थ किया है लोग इसे भी केन्द्र का प्रयोग ही मानते हैं। वैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र में लम्बे समय तक फील्ड में पदस्थ संतकुमार पासवान को जेल में सीमित करना भी सरकार का प्रयोग ही हो सकता है। सरकार के प्रयोग के चलते ही राजीव माथुर प्रदेश छोड़कर चले गये। अनिल नवानी को होमगार्ड, बस्तर में आईजी की जिम्मेदारी सम्हालने वाले एडीजी अंसारी को लोक अभियोजन, बस्तर के पुलिस अधीक्षक रहे जीपी सिंह को खेल संचालन बनाना, कभी भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पदस्थापना नहीं होने वाले अफसर राजेश मिश्रा को प्रवक्ता बनाना निश्चित ही सरकार का नया प्रयोग हो सकता है।
और अब बस
(1)
बस्तर में पुलिस महानिरीक्षक लॉगकुमेर का सरकार के पास कोई विकल्प नहीं है एक टिप्पणी- पहले तो डीएम अवस्थी का भी कोई विकल्प नहीं है यह कहा जाता था?
(2)
रायपुर के कलेक्टर रोहित यादव और पुलिस कप्तान दीपांशु काबरा पहले नक्सली प्रभावित क्षेत्र में रह चुके हैं, इसलिए राजधानी में नक्सलियों के पहुंचने की खबर से लोगों को चितिंत होने की जरूरत नहीं है।
(3)प्रदेश की कानून व्यवस्था से चितिंत होकर मुख्यमंत्री कल सभी आईजीएसपी की बैठक ले रहे हैं। एक टिप्पणी-पहले गृहमंत्री, डीजीपी विवाद का हल तो सोचें?

Sunday, November 28, 2010

मनुष्य जाति की सभ्यता का जन्म स्थान
शंकर पांडे
हमारे छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने दिल खोलकर सजाया है। खूबसूरत वन, हरे-भरे खेत-खलिहान विस्तृत पर्वत श्रृंखलाएं, जीवंत आदिवासी संस्कृति उन्मुक्त वन्य प्राणी सहित जैव विविधता यहां की अनोखी विशेषता है। ऐतिहासिक धरोहरों के रूप में प्राचीन सभ्यता के उत्कृष्ट पुरातात्विक अवशेष, लोक-जीवन और संस्कृति के अनोखे रंग इस धरती को बाकी भौतिक दुनिया से अलग करते हैं। यहां अबूझमाढ़ की प्राचीन जनजातियां है तो भिलाई और कोरबा की अत्यंत आधुनिक कम्प्यूटर पीढ़ी भी है। विविधता का ऐसा उदाहरण विश्व में शायद ही कहीं दिखाई देता होगा।छत्तीसगढ़ अपनी 10 वीं सालगिरह मना रहा है। इस प्रदेश का इतिहास काफी समृद्ध है। मनुष्य जाति की सभ्यता का यह जन्मस्थान माना जाता है तो लिपी के विकास का भी यहां से सीधा-सीधा संबंध रहा है। आदिमानव, पाषणकाल के औजार तो यहां मिले ही हैं साथ ही साथ सबसे प्राचीनतम नाट्यशाला की भी यहां मौजूदगी पाई गई है। हाल-फिलहाल पचराही में मिले पाषाण भी यहां के समृद्ध इतिहास की तरफ इशारा कर रहे हैं। नया राज्य बना, विकास के कई सोपान तय किये गये, कई सोपान अभी तय भी करने है पर हमें अपने अतीत को भी भावी-पीढ़ी के लिये सहेजने की ईमानदारी से कोशिश करनी चाहिये। प्रख्यात पुरातत्ववेत्त स्व. पं. लोचन प्रसाद पांडे ने संवत 2000 में एक लेख में उल्लेख किया था कि 'यदि कहा जाए कि वर्तमान छत्तीसगढ़ अर्थात् महाकोशल मनुष्य शांति की सभ्यता का जन्मस्थान है तो भले ही आप इसे महत्व न दें किंतु मैंने इस अरण्य तथा पिछड़े प्रांत के वनवासियों के सहवासी उच्च शिक्षा प्राप्त विद्बान को भारत विख्यात इतिहासज्ञों के बीच यह कहते सुना है कि वर्तमान समय में हमारा कोई इतिहास नहीं है पर यह निश्चित है कि मानव जाति की आदि सभ्यता यही पली थी।Ó स्व. लोचन प्रसाद पांडे ने अपने ग्राम बालपुर के निकट रोमन तथा भिन्न-भिन्न मुद्राएं और अन्य वस्तुएं प्राप्त की थी। कवरा पहाड़ी रायगढ़ से लगभग 10 मील दूर आग्नेय कोण में स्थित है। यहां की चित्रकारी गेरूका रंग सी जान पड़ती है। पहाड़ी में 2 गुफाएं भी हैं। तीसरी गुफा में विश्वविख्यात चित्र रचित हैं। एक चित्र में बहुत से पुरुष लाठी लेकर किसी एक बड़े पशु का पीछा करते हुए दौड़े जा रहे हैं। पास ही एक छोटा पशु (भेड़ या बकरा) एक व्यक्ति के सिर पर हमला करता दिखाई दे रहा है। इसके समय विषय में पुरातावेज्ञों में मतभेद है। कोई इन्हें 20 हजार तो कोई 50 हजार साल पुराना बता रहे हैं।महानदी तथा उसकी सहायक शिवनाथ, हसदो और मांद नदियों के अपवाह क्षेत्र में मध्य पाषाण काल, नवपाषाण काल के उपकरण विपुल मात्रा में प्राप्त होते रहे हैं। रायगढ़ के सिघनगढ़, कबरापहाड़, बसनाझर, ओंगना आदि 13 स्थानों में विद्यमान शैलगुहाओं एवं शैलाश्रयों में मध्यपाषाण एवं नवपाषाण सांस्कृतिक काल के आखेटको का निवास था। इन शैलाश्रयों में विद्यमान चित्रों के विषय में तत्कालीन परिवेश के साथ-साथ समकालीन सांस्कृतिक जीवन के वैशिष्टियों को प्रस्तुत करते हैं। रायगढ़ से संलग्न सारंगढ़ की पहाडिय़ों, पश्चिम दिशा की ओर डोंगरगढ़ अंचल के बोरतालाब, साल्देकसा के शैलाश्रयों और बस्तर के शैलाश्रयों के चित्रों से इस संस्कृति की व्यापकता स्थूल रूप से संपूर्ण छत्तीसगढ़ पर्यंत स्वीकार की जा सकती है। बालोद तहसील के अर्जुनी से ताम्र उपकरण मिले है तो बालोद के ही गुरुर के चारों ओर स्थित गांवों में महाश्मीय संस्कृति (मेगालिथिक कल्चर) से संबंधित स्मारक बड़ी संख्या में विद्यमान है। मुसगहन, घनोरा, कर्काभाट, करहीमदर, सोसर और कुलियों में 1500 से अधिक महाश्मीय स्मारक थे। कर्काभाट तथा आसपास किये गये उत्खनन से मिली सामग्रियों के आधार पर महाश्मीय संस्कृति का काल 2500 ईपू से 1500 ईपू माना गया है। यह सांस्कृतिक काल लौह युगीन था।ताजमहल से भी प्राचीन इंटो का सिरपुर स्थित लक्ष्मण मंदिर अपनी प्राचीनता की कहानी कह रहा है तो रायगढ़ जिले के सिंघनपुर, विक्रमखोल तथा करमागढ़ की पर्वत श्रेणियों में आदि मानव के औजार और शैलचित्र मिले हैं। सिंघनपुर की पहाडिय़ों की सतह पर जो रेखाएं और रेखाकृतियां अंकित है उन्हें प्राचीनकाल की लिपि की जननी माना गया है। इन रेखाकृतियों में ऐसा चिंह मिला है जिनका संबंध जोदड़ों में प्राप्त लिपियों से हो सकता है। हिंदु विश्वविद्यालय वाराणसी डॉ. प्राणनाथ इस लिपि को 1500-2000 ई.पू माना है। यहां मिले चित्र और औजार पूर्वकाल की धरोहर है। सिंघनपुर के कुछ अक्षर जैसे 'क ख घ च छ त न प मÓ अपने प्रारंभिक स्वरूप में पाये गये हैं। संभवत: लिपि का विकास इन्हीं चित्रों से हुआ है। अत: रायगढ़ के पर्वतों से प्राप्त पाषाणकालीन चित्रों को हम मनुष्य की सभ्यता के विकास का प्रथम चरण कह सकते हैं। सरगुजा रामगढ़ में ईसा से 300 वर्ष पूर्व की नाट्यशाला प्राचीनतम मानी जाती है। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ का अतीत काफी समृद्ध था और इसे संजीव रखने की जरूरत है।


राज्योत्सव 10 पर विशेष
शिवाजी महाराज भी आ चुके हैं छत्तीसगढ़
शंकर पांडे
मुगल बादशाह औरंगजेब की कैद से निकलकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने सरगुजा के जंगलों सहित रतनपुर के नवांचलों में गुजारने के पश्चात रायपुर होकर चंद्रपुर (विदर्भ) होकर अपने रायगढ़ (महाराष्ट्र) के किले में पहुंचे थे। 14 अगस्त 1662 से 22 सितंबर 66 तक उन्होंने कुछ समय छत्तीसगढ़ मे भी गुजारा था। राज्योत्सव की दसवीं सालगिरह पर एक सनसनीखेज तथ्य।मुगल बादशाह औरंगजेब ने छलपूर्वक शिवाजी महाराज को सन् 1966 में आगरा के किले में कैद कर लिया था। 1662 में औरंगजेब को शिवाजी, संभाजी बेटे के साथ साथ अपने नौ वर्षीय के साथ अपना 50 वां जन्मदिन के अवसर पर एक योजना के तहत औरंगजेब ने आमंत्रित किया था। शिवाजी को कंधार, अफगानिस्तान भेजने की योजना थी इसके लिए मजबूत मुगल साम्राज्य सीमा के उत्तर पश्चिमी, अदालत ने हालांकि 1662 मई 12, औरंगजेब के बारे में उनकी अदालत के पीछे सैन्य कमांडरों खड़ा कर दिया। शिवाजी को अपमान प्रतीयमान इस अपराध में ले लिया और अदालत के बाहर हमला कर दिया और तुरंत गिरफ्तार कर लिया। बाद में आगरा कोतवाल को अपने जासूसों से पता चला है कि औरंगजेब, शिवाजी को राजा हवेली को अपने निवास ले जाने के लिए और फिर संभवत: उसे मारने के लिए या उसे अफगान सीमा में लडऩे के लिए भेजने की योजना बनाई , एक परिणाम के रूप शिवाजी ने भागने की योजना बनाई। इसके बाद उसके अनुरोध पर मंदिरों में आगरा और दैनिक लदान के मिठाई के लिए संतों उपहार और प्रसाद के रूप में भेजने के लिए अनुमति दी और कई दिनों के बाद शिवाजी, मिठाई और अन्य सामग्री बाहर भेजने बक्से में अपने नौ साल के बेटे संभाजी, खुद को बक्से में छिपा दिया और भागने में कामयाब रहे। इस तरह 14 अगस्त 1666 को ही बड़ी चतुराई से शिवाजी महाराज कैद से भागने में सफल हो गये थे। प्रमाणिक जानकारी के अनुसार जब मूगलों को शिवाजी महाराज के कैद से भागने की खबर मिली तो मुगलों ने रायगढ़ (महाराष्ट्र) किले की ओर जाने वाले सभी मार्गों पर मोर्चाबंदी की थीं पर शिवाजी महाराज दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर-पूर्व की ओर जाना ही उचित समझा। वे उस समय इटावा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी होकर मिर्जापुर पहुंचे। वहां से सरगुजा-रतनपुर-रायपुर-चंद्रपुर होकर चिन्नूर, करीमगंज, मुलबर्ग, मंगलबेड़ा होकर वापस अपने रायगढ़ (तब विदर्भ) के किले में पहुंचने में सफल हो गये थे।शिवाजी महाराज ने छत्तीसगढ़ के सरगुजा और रतनपुर के वन्य अंचलों में कितने दिन गुजारे और रायपुर होकर चंद्रपुर (महाराष्ट्र) कब गये यह तिथि तो ज्ञात नहीं हो सकी है परंतु आगरा में औरंगजेब की कैद से वे 14 अगस्त 1966 के दिन भाग निकले थे और 22 सितंबर 1662 को वापस अपने रायगढ़ किले में पहुंचे थे। इसका मतलब यही है कि एक महीने 8 दिन कुछ दिन जरूर छत्तीसगढ़ प्रवास पर रहे थे।जयराम पिण्डे (1673) तथा भीमसेन सक्सेना (1966) ने अपने लेख में खुलासा किया था, वहीं शिवाजी महाराज के भागने के मार्गों का भी जिक्र किया था। मुगल बादशाह औरंगजेब का इतिहास लिखने वाले खाफी खां ने भी इसका उल्लेख किया है। मुगलकालीन इतिहास के लिये खाफी खां को मुगलों के इतिहास के लिये प्रमाणिक माना जाता है। उन्होंने भी शिवाजी महाराज के औरंगजेब की कैद से भागने के मार्ग और क्रियाकलापों का उल्लेख किया है। पुस्ट जानकारी के अनुसार शिवाजी महाराज ने मुगलों की कैद से भागकर आगरा से अपने पुत्र संभाजी को दासोजी पंत के पास छोड़ दिया। उसके बाद वे कृष्णपंत के साथ फतेहपुर के पास यमुना पार किया, चूंकि दक्षिण जाने के मार्ग पर मुगलसेना शिवाजी को तलाश रही थी इसलिये वे इटावा, कानपुर, इलाहाबाद होते हुए वाराणसी पहुंचे थे। वाराणसी से मिजापुर होकर सरगुजा (छत्तीसगढ़) पहुंचे। यहां के जंगलों से होकर वे रतनपुर पहुंचे। सुदूर और वनांचल क्षेत्र होने के साथ ही उस समय सरगुजा-रतनपुर के जंगल काफी दुर्गम होने के कारण सुरक्षित थे। रतनपुर से रायपुर होकर शिवाजी महाराज चंद्रपुर (विदर्भ) पहुचे और वहां से चिन्नूर, करीमगंज, गुलबर्ग, मंगलबेड़ा होकर 22 सितंबर 1662 को रायगढ़ जिले वापस पहुंच गये थे।

बिलासपुर जेल में लिखी गई थी कविताएं: शहर का भी उल्लेख
शंकर पांडे
महान साहित्यकार पं. माखनलाल चतुर्वेदी 'दादाÓ की जन्म स्थली बाबई (होशंगाबाद) मध्यप्रदेश है। वे अपने साहित्य के नाम पर अमर हो गये है। चतुर्वेदी लाल दादा माखन जन्म 4 अप्रैल 1889 को होशंगाबाद जिले के एक गांव में हुआ था। एक प्रख्यात लेखक, निबंधकार, कवि, पत्रकार और नाटककार के रूप में उन्होंने देश को बहुत कुछ दिया। यही नहीं उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके लिये उन्होंने 1912 में शिक्षक के पद से इस्तीफा दे दिया है और पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया पत्रिकाओं कर्मवीर प्रभा आदि में संपादन किया और 1959 में सागर विश्वविद्यालय भारत की ओर से है डीलिट की उपाधि दी गई, वहीं उन्हें पदमविभूषण से सम्मानित किया गया। 78 वर्ष की आयु में 1968 वर्ष में उनका निधन हो गया। बतौर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उन्हें अंग्रेजों ने बिलासपुर जेल में नजरबंद कर दिया था। इस जेल में पंडित जी ने 13 कविताओं की रचना की जिसमें पुष्प की अभिलाषा, कैदी और कोकिला तथा मेरा व्रत पूजन काफी प्रसिद्ध रही। छत्तीसगढ़ को महान साहित्यकार पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने अमर कर दिया है। होशंगाबाद (म.प्र.) के बाबई नामक एक गांव के मूल निवासी पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने साहित्य साधना के साथ भारत की आजादी के आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्हें अंग्रेज शासकों ने किसी मामले में गिरफ्तार कर 5 जुलाई सन् 1921 को बिलासपुर (छत्तीसगढ़) जेल में स्थानांतरित कर दिया था। वे 5 जुलाई 1921 से एक मार्च 1922 तक वे बिलासपुर जेल में बंद रहे। इस दौरान जेल के भीतर उनसे रस्सी आदि बनवाने का काम भी लिया जाता था जिसका उन्होंने उल्लेख भी किया है। बहरहाल जेल के भीतर बंद होकर भी उनका कवि हृदय नई कविताओं का सृजन करता रहा।बिलासपुर जेल के भीतर ही 18 फरवरी 1922 को उन्होंने पुष्प की अभिलाषा शीर्षक की एक कविता लिखी थी जो काफी चर्चित भी रही।चाह नहीं मैं सुरबाला केगहनों में गूंथा जाऊंचाह नहीं, प्रेमी-माला मेंविंध प्यारी को ललचाऊंचाह नहीं, सम्राटों के शवपर हे हरि डाला जाऊंचाह नहीं, देवों के सिर परचढूं भाग्य पर इठलाऊंमुझे तोड़ लेना वनमालीउस पथ पर देना तुम फेंकमातृभूमि पर शीश चढ़ानेजिस पथ जाएं वीर अनेक(बिलासपुर जेल 18 फरवरी 1922) वैसे जेल के भीतर नजरबंद पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने 'कैदी और कोकिलाÓ नामक कविता सहित कुल 13 कविताएं लिखी थीं। उन्होंने उल्लेख किया है कि 7 नवंबर 1921 को मैं एक दिन बिलासपुर जेल के भीतर रस्सी बना रहा था। मेरे पास रस्सी का ढेर था। तब जेल के एक उच्च कर्मचारी ने आकर कहा- क्या यह आपका धंधा है, आखिर आपने यह ढेरा क्यों लिया है। उसकी इच्छा थी कि मैं जेल के भीतर दुख की जिंदगी से किसी तरह छुट्टी पा लूं। उसका संकेत था कि क्षमा प्रार्थना कर जेल से छुट्टी पा लूं। पर उस दिन मेरा 'मौनÓ था। मुस्कुराने के सिवा मेरे पास कोई इलाज नहीं था। दूसरे दिन उसी कर्मचारी ने आकर मेरी डायरी पढ़ा और उसके पश्चात वह सदैव यत्नशील रहा कि कभी मेरा जी न दुखाया जाए। इसी संदर्भ में पंडितजी ने 'मेरा व्रत पूजनÓ में एक कविता लिखी जिसमें बिलासपुर (छत्तीसगढ़) का भी उल्लेख किया था।सन् नहीं तन भारतीयों से मिलाता हूंचक्कर लगाते हुए अलख जगाता हूंयो विश्व बांधने को प्रेम बंधन बनाता हूंनाम ही तो पाता हूं बिलासपुरवासियों सेमैं तो तीर्थराज इन सीखचों में पाता हूंस्वर की कलिन्दजा में मस्ती की सरस्वती लेनयनों की गंगा बना, त्रिवेणी नहाता हूं (बिलासपुर जेल 1921)
राज्योत्सव 2010 पर विशेष
बस्तर बाल-बाल बचा उड़ीसा में शामिल होने से
शंकर पांडे
आदिवासी अंचल बस्तर को तत्कालीन म.प्र., आंध्रप्रदेश तथा उड़ीसा अपने राज्य में शामिल करना चाहते थे। हैदराबाद के निजाम ने तो बैलाडिला को लीज में लेने का प्रस्ताव भी बस्तर रियासत के समक्ष रखकर 1922 में सर्वे भी करा लिया था। खैर बस्तर को उड़ीसा में मिलाने एक आंदोलन भी चलाया गया था। बस्तर उड़ीसा राज्य में शामिल तो नहीं हो सका पर पुरस्कार स्वरूप आंदोलन की अगुवाई करने वाले अभिमन्यु रथ को बाद में उड़ीसा कोटे से राज्यसभा सदस्य बनाया गया।बस्तर की रत्नगर्भा धरती और अकूत वन संपदा को लेकर कुछ प्रदेश इसे अपने राज्य में शामिल करने प्रयासरत रहे। जमशेद भाई दादा ने तो यहां काफी पहले कारखाना स्थापित करने सर्वे कराया तथा वे स्वयं बस्तर प्रवास पर भी आ चुके थे पर यातायात संसाधन नहीं होने के कारण बात आगे नहीं बढ़ी थी। हैदराबाद के निजाम ने बैलाडिला को लीज पर लेने का प्रस्ताव तत्कालीन बस्तर रियासत के सामने रखा था। सर्वे में उनके वैज्ञानिकों ने हजारों टन लौह अयस्क होने की पुष्टि कर दी थी। बहरहाल 1947 तक यह मामला कई कारणों से अटकता ही रहा। इसके बाद आंध्रप्रदेश ने तेलगू भाषी क्षेत्रों को अपने प्रदेश में मिलाने की रूचि दिखाई थी। पर 1952-56 में उड़ीसा राज्य में बस्तर को मिलाने बकायदा एक आंदोलन उड़ीसा की तत्कालीन सरकार के सहयोग से अंचल के लेखक, वक्ता, राजनीतिज्ञ अभिमन्यु रथ के नेतृत्व में शुरू किया गया। 1952 के आम चुनावों में उड़ीसा ही एक ऐसा राज्य था जहां कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और उसे गणतंत्र परिषद (राजाओं, जमींदारों की पार्टी) के साथ मिलकर सरकार बनाना पड़ा। इस सरकार के मुख्यमंत्री बने डा. हरेकृष्ण मेहताब। वे उत्कल-संस्कृति से प्रभावित आंध्रा का भाग भी उड़ीसा में मिलाकर उड़ीसा का सर्वांगीण विकास करना चाहते थे। वे मानते थे इसके लिये बस्तर के भीतर से उड़ीसा राज्य में शामिल होने की आवाज उठे और वहां के लोग राज्य पुनर्गठन आयोग को इसकी सिफारिश करें फिर उड़ीसा राज्य भी अपना दावा ठोकेगा। इसके लिये उन्होंने जगदलपुर के स्थायी निवासी अभिमन्यु रथ को इसके लिये कमान सौंपी। इसके लिये रथ ने बस्तर के पूर्वी अंचल के भतरा आदिवासियों को पकड़ा, उनकी भाषा-संस्कृति भी उड़ीसा से मेल खाती थी। करीब एक लाख हस्ताक्षर राज्य पुनगर्ठन आयोग के अध्यक्ष सैय्यद फजल अली से मुलाकात की और पक्ष भी रखा। जब यह खबर सीपी एंड बरार के मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल और तत्कालीन गृहमंत्री को मिली तो पं. शुक्ल ने अपने मित्र सुंदरलाल त्रिपाठी को इसके विरोध में खड़ा किया। उनके समझाने पर भी जब अभिमन्यु रथ नहीं माने तो त्रिपाठी जी ने जवाबी आंदोलन की शुरूवात कर दी। अभिमन्यु रथ ने बस्तर को उड़ीसा में मिलाने के समर्थन में जगदलपुर में एक रैली निकाली जिसमें हजारों आदिवासी शामिल थे। पं. सुंदरलाल त्रिपाठी ने भाषायी कूटनीति का अस्त्र भी चलाया। एक पर्चा छपवाया कि यदि बस्तर को उड़ीसा में शामिल किया गया तो बच्चों को अतिरिक्त भाषा 'उडिय़ाÓ भी पढऩी पढ़ेगी, जिन सरकारी कर्मचारियों को उडिय़ा नहीं आती है उन्हें उड़ीसा सरकार नहीं लेगी तथा वर्तमान सरकार भी कहीं दूरदराज तबादला कर देगी। इधर उस समय के बस्तर के हालात पर प्रसिद्ध उपन्यासकार शानी ने 'कस्तुरीÓ में लिखा था कि 'हम बस्तर में है तो सरकार हमें कौन से लड्डू खिला रही है और उड़ीसा में रहेंगे तो कौन कड़ाही में तले जाएंगे।Ó तब कांग्रेसी ऐसे प्रश्नों के सामने निरूत्तर हो जाया करते थे। बाद में जनमानस बदला, अभिमन्यु रथ की गिरफ्तारी हुई, बात प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू तक पहुंची और बस्तर-बड़ीसा में जाते-जाते रह गया। हां उड़ीसा में बस्तर को शामिल करने के लिये प्रयास करने के नाम पर अभिमन्यु रथ को तत्कालीन उड़ीसा सरकार ने राज्यसभा सदस्य बनवा दिया था। वे जगदलपुर में ही रहकर 6 सालों तक राज्यसभा का प्रतिनिधित्व किया, संभवत: वे बस्तर अंचल से पहले और अभी तक आखरी राज्यसभा सदस्य रहे। बाद में वे नगरपालिका जगदलपुर में पार्षद भी बने। कुछ वर्षों पूर्व रायपुर रेलवे स्टेशन में हृदयाघात से उनका निधन हो गया और जगदलपुर में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके परिवारजन अभी भी जगदलपुर में रहते हैं।

'धान के कटोरेÓ में 'सोने के सिक्कोंÓ का कभी चलन था
शंकर पांडे
'धान के कटोरेÓ के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में विश्व की 12 हजार 500 धान की प्रजातियों में करीब 10 हजार प्रजाति केवल छत्तीसगढ़ में ही पाई जाती है। धान के इस कटोरे का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। कभी यहां सोने-चांदी के सिक्कों का चलन था। व्यापारिक क्षेत्र में भी छत्तीसगढ़ काफी समृद्ध था। गरियाबंद के पास ग्राम सिरकट्टी में पैरी नदी के तट पर नदी बंदरगाह (डॉकयार्ड) के अवशेष मिले है। छत्तीसगढ़ से 'रोमÓ का व्यापार प्राचीनकाल में नदी मार्ग से होता था इसकी पुष्टि भी नये बंदरगाह के अवशेष मिलने से होती है।'धान के कटोरेÓ के नाम से चर्चित छत्तीसगढ़ का इतिहास काफी गौरवशाली है। यहां कभी सोने के सिक्के भी चलते थे। कुछ पुरातात्विक स्थलों की खुदाई में 'रोम के सोने के सिक्केÓ भी मिले है। ये छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और व्यापारिक संबंध विदेशों से होने की भी वकालत करते हैं।छत्तीसगढ़ में कभी स्वर्ण मुद्राएं प्रचलित थी। भारत का पश्चिम देशों से व्यापारिक संबंध अनादिकाल से चला आ रहा है। इसका प्रभाव तब छत्तीसगढ़ में भी पड़ा था। छत्तीसगढ़ में भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशों के सोने के सिक्के भी मिले है। बिलासपुर तथा चकरबेढ़ा नामक गांव में 'रोमÓ के 2 सोने के सिक्के प्राप्त हुए है जो आज भी महंत घासीदास संग्रहालय में सुरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में चौथी शताब्दी में गुप्त वंश का प्रभाव पड़ा था। समुद्रगुप्त के काल के 20 सोने के सिक्के बनबरद गांव में ही मिले हैं। इनमें से एक सिक्का काच, एक समुद्रगुप्त और 7 चंद्रगुप्त के समय का है। 'काचÓ समुद्रगुप्त के सुपुत्र थे जिसे रामगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। इन सिक्कों में शौर्य, रणक्षेत्र के प्रतीक अजेय राजाओं के सुसज्जित चित्र और वीणा वजाते राजा का चित्र अंकित है। कुछ सिक्कों में अश्वमेघ यज्ञ और माता-पिता के प्रति श्रद्धा के दृश्य अंकित हैं। भरमपुर वंशों के कार्यकाल में भी स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन था। छत्तीसगढ़ की राजधानी शरभवंश के काल में सिरपुर थी। वहां खुदाई से सोने के सिक्के मिले हैं। स्वर्ण मुद्रा अमरार्यकुल के राजा प्रसन्न मात्र की मुद्रा थी। सिक्कों का चलन तब कटक से लेकर चांदा तक प्रचलित था। कल्चुरी नरेश प्रथम जाजल्लदेव ने भी सोने के सिक्के जारी किये थे। इन सोने के सिक्कों के अग्रभाग में श्री जाजल्लदेव और पृष्ठ भाग में कलिंग देश के नृपतिगंग पर मिली विजय का प्रतीक राजशार्टूल चिंह अंकित है। रतनपुर के अनेक कलचुरि नरेशों ने स्वर्ण सिक्के जारी किये थे। दिसंबर 1972 के प्रथम सप्ताह दुर्ग जिले के वानवरद गांव में गुप्तकालीन 9 स्वर्ण सिक्के मिले हैं। इसके पूर्व बिलासपुर में एक गुप्त स्वर्ण सिक्का मिला था। नरेश प्रसन्नमात्र के समय के पांचवीं-छठवीं शताब्दी के कार्यकाल के स्वर्ण सिक्के दक्षिण कोसल के अनेक स्थानों पर मिल चुके हैं। इन सिक्के पर आवक्ष लक्ष्मी और गरूड़ के साथ ही शंख चक्र भी विद्यमान है। वैसे यह सिक्का भग्नावस्था में मिला है। पं. लोचन प्रसाद पांडे ने शोधपत्र के अनुसार बालपुर और महानदी के आसपास अनेक सोने के सिक्के मिले है। हैहृयवंशियों के सोने और चांदी के सिक्कों पर पं. लोचनप्रसाद पांडे ने शोधपत्र भी तैयार किये थे जिनका प्रकाशन आंध्रा हिस्टारिकल रिसर्च सोसायटी में हुआ था। इंडियन म्यूजियम कलकत्ता के पुरातात्विक विभाग के तत्कालीन अधीक्षक वीआर चंद्रा ने तब स्वीकार किया था कि हैहृयवंशी पृथ्वीदेव, जाजल्लदेव और रत्नदेव के समय सोने के सिक्के चलते थे। अभी भी सेंट्रल म्यूजियम नागपुर में कुछ सोने के सिक्के रखे हुए हैं। छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक सोने के सिक्कों के एक साथ मिलने का रिकार्ड बिलासपुर जिले का है। इस जिले के सोनसरी गांव में जमीन के भीतर तांबे के बर्तन में एक साथ 600 सोने के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इसमें 459 सिक्के राजा पृथ्वीदेव (1140-1160 ए.डी.) 36 सिक्के राजा जाजलनदेव (1160-1175 ए.डी.) और 96 सिक्के राजा रत्नदेव (1175-1190 ए.डी.) के शासनकाल के है तो 9 सिक्के दूसरों के शासनकाल के थे। मल्हार के गांवों में खुदाई के समय भी सोने के सिक्के मिले थे। सोने के अलावा चांदी के सिक्के भी छत्तीसगढ़ में प्रचलित थे। नंद-मौर्यकाल में चांदी के सिक्कों का प्रचलन था। रायपुर जिले के तारापुर, रायगढ़ जिले के सारंगढ़ साल्हेपाली बिलासपुर जिले के अकलतरा के पास चांदी के सिक्के भी खुदाई के दौरान मिल चुके हैं।

Monday, November 22, 2010

हालात ने अजीब तमाशे दिखाय्ो हैं
रिश्ते बदल गय्ो कभी रास्ते बदल गय्ो

छत्तीसगढ राज्य्ा का दसवां स्थापना वर्ष हाल ही में मनाय्ाा गय्ाा है। इन 1॰ सालों में कई अविश्वनीय्ा बातें प्रकाश में आती रही है। लगता है कि छत्तीसगढ में घटित घटनाओं को लेकर ही एक अहिंदीभाषी अफसर ने ’विश्वसनीय्ा छत्तीसगढ‘ का स्लोगन तैय्ाार कर डॉ. रमन सिंह से स्वीकृति भी ले ली और राज्य्ाोत्सव पर वह स्लोगन चर्चा में भी रहा। वैसे अविश्वसनीय्ा घटनाओं के बीच विश्वास पैदा करने की जरूरत तो थी ही! राज्य्ा बनते समय्ा कभी प्रधानमंत्र्ाी के बाद की स्थिति में रहने वाले पूर्व केन्द्रीय्ा मंत्र्ाी विद्याचरण शुक्ल ने तत्कालीन गृहमंत्र्ाी लालकृष्ण आडवाणी से भी मुख्य्ामंत्र्ाी बनाने का अनुरोध किय्ाा पर वे तैय्ाार नहीं हुए। दिग्विजय्ा सिंह से उनके फार्म हाऊस में दुव्यर््ावहार भी चर्चा में रहा। विद्याचरण शुक्ल, श्य्ाामा चरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा के रहते एक पूर्व नौकरशाह अजीत जोगी को छत्तीसगढ का पहला मुख्य्ामंत्र्ाी बनाय्ाा गय्ाा था य्ाह क्य्ाा उस समय्ा विश्वसनीय्ा था? छत्तीसगढ राज्य्ा का निर्माण होने को 1॰ साल हो चुके हैं, अजीत जोगी के बाद डॉ. रमन सिंह मुख्य्ामंत्र्ाी बने हैं। लगातार दूसरी बार भाजपा की सरकार बनी और पांच साल का एक कायर््ाकाल पूरा करने के बाद दूसरी बार सरकार बनाकर पुनः मुख्य्ामंत्र्ाी बनकर डॉ. रमन सिंह ने भी रिकार्ड बनाय्ाा है। वैसे भाजपा सरकार के मुख्य्ामंत्र्ािय्ाों में गुजरात के नरेंद्र मोदी के बाद डॉ. रमन सिंह का क्रम दूसरे नंबर में है। जहां तक राज्य्ापालों का सवाल है तो 1॰ साल के कायर््ाकाल में 4 राज्य्ापाल तैनात हो चुके हैं। दिनेश नंदन श्रीवास्तव, के एम सेठ, नरसिम्हन के बाद शेखर दत्त की य्ाहां निय्ाुक्ति हुई है। दिनेशनंदन श्रीवास्तव तथा ई एस एल नरसिम्हन जहां पूर्व में आईपीएस अफसर रह चुके थे तो के एम सेठ सैन्य्ा अधिकारी थे तो शेखर दत्त पूर्व आईएएस अफसर रह चुके हैं। शेखर दत्त तो अविभाजित मध्य्ाप्रदेश में राय्ापुर संभाग के कमिश्नर भी रह चुके हैं वहीं छत्तीसगढ विकास प्राधिकरण से भी जुडे रहे हैं।
विस अध्य्ाक्ष!
छत्तसगढ के पहले विधानसभ अध्य्ाक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ला का असमय्ा निधन हो गय्ाा। भाजपा की सरकार बनने से वहले बनवारी लाल अग्रवाल (भाजपा) उपाध्य्ाक्ष बने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिय्ाा और धर्मजीत सिंह विस उपाध्य्ाक्ष बने।पहली बार छत्तीसगढ में कांगे€स का अध्य्ाक्ष तथा उपाध्य्ाक्ष बनने की परंपरा शुरू हुई जो अनवरत जारी है। भाजपा की पहली सरकार बनी तो विधानसभा अध्य्ाक्ष का रदाय्ाित्व प्रेमप्रकाश पांडे तथा उपाध्य्ाक्ष का दाय्ाित्व बुर्जुग राजनेता बद्रीधर दीवान ने सम्हाला। पर विधानसभा चुनाव में बतौर विस अध्य्ाक्ष चुनाव लडने वाले प्रेमप्रकाश पांडे हार गय्ो य्ाह परिणाम भी अविश्वसनीय्ा रहा। बद्रीधर दीवान चुनाव तो जीत गय्ो पर विस उपाध्य्ाक्ष बनने तैय्ाार नहीं हुए। छत्तीसगढ राज्य्ा के तीसरे विस अध्य्ाक्ष धरमलाल कौशिक बने तो उपाध्य्ाक्ष नाराय्ाण सिंह चंदेल को बनाय्ाा गय्ाा।
गृहमंत्र्ाी!
छत्तीसगढ राज्य्ा बनने के बाद पहले मुख्य्ामंत्र्ाी अजीत जोगी के कायर््ाकाल में नंदकुमार पटेल पहले गृहमंत्र्ाी रहे तो डॉ. रमन सिंह के मुख्य्ामंत्र्ाी बनने के बाद सर्वश्री बृजमोहन अग्रवाल, रामविचार नेताम के बाद ननकीराम कंवर गृहमंत्र्ाी बने हैं। सामान्य्ा वर्ग से मुख्य्ामंत्र्ाी बने डॉ. रमन सिंह के साथ सामान्य्ा वर्ग से ही गृहमंत्र्ाी बृजमोहन अग्रवाल को बनाय्ाा गय्ाा फिर उन्हें हटाकर आदिवासी वर्ग से रामविचार नेताम फिर ननकीराम कंवर को गृहमंत्र्ाालय्ा सौंपा गय्ाा पर जिस तरह से आदिवासी अंचल बस्तर में नक्सलवाद और पनपा है, 76 सी आरपीएफ जवानों का नक्सलिय्ाों द्वारा नरसंहार किय्ाा गय्ाा, पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे की नक्सलिय्ाों द्वारा हत्य्ाा की गई, बारुद की सबसे बडी लूट नक्सलिय्ाों ने की, पुलिस का इतना बडा अमला रहने के बाद भी ’एचएम स्क्वॉड‘ गठित करना पडा, गृहमंत्र्ाी ननकीराम कंवर को जिस तरह डीजीपी विश्वरंजन अक्सर चुनौती देते दिखाई देते हैं दोनों के बीच मतभेद मीडिय्ाा के सामने आते रहते हैं वह भी कम से कम पुलिस की कायर््ाप्रणाली के लिय्ो विश्वसनीय्ा तो नहीं कहा जा सकता है। पूर्व गृहमंत्र्ाी एवं जेल मंत्र्ाी रामविचार नेताम के कायर््ाकाल में नक्सली आतंक बढा तो बढा साथ ही जिस तरह दंतेवाडा में नक्सलिय्ाों का सबसे बडा जेलबे€क हुआ उसमें केवल जेल के डिप्टी जेलर को मुजरिम बनाय्ाा गय्ाा, उसका नार्कों टेस्ट भी नहीं हुआ तथा उस पर राजद्रोह का आरोप लगाकर उसकी निय्ामानुसार राज्य्ा सरकार से पुष्टि नहीं की गई और न्य्ााय्ाालय्ा द्वारा उसे छोडना पडा य्ाह भी कम चर्चा में नहीं रहा क्य्ाा य्ाह पुलिस की कायर््ाप्रणाली की विश्वसनीय्ाता की झ्ालक नहीं है।
मुख्य्ासचिव और डीजीपी
छत्तीसगढ राज्य्ा बनने के बाद पहले डीजीपी मोहन शुक्ल बने फिर पी के दास, अशोक दरबारी, आर एस य्ाादव बने फिर ओ पी राठौर, विश्वरंजन डीजीपी बने, वैसे संतकुमार पासवान, अनिल नवानी भी डीजीपी का कायर््ाभार सम्हाल चुके हैं। जहां मतक मुख्य्ा सचिव का सवाल है तो अरूण कुमार, ए के विजय्ावर्गीय्ा, एस के मिश्रा, आर पी बगई, शिवराज सिंह, जाय्ा उम्मेन को मुख्य्ा सचिव बनाय्ाा बी के एस रे की उपेक्षा कर 5 साल जूनिय्ार उम्मेन को मुख्य्ा सचिव बनाना भी विश्वसनीय्ा निर्णय्ा नहीं कहा जा रहा था। खैर अब जाय्ा उम्मेन की भी चला-चली की बेला है। नाराय्ाण सिंह, सरजिय्ास मिंज, सुनील कुमार कतार में है। तो विश्वरंजन की भी ज्य्ाादा दिन ’सरकार‘ से बनेगी ऐसा लगता नहीं है। वैसे संतकुमार पासावान और अनिल नवानी भी अब डीजी बन चुके हैं और इन दोनों अफसरों को डीजीपी बनने का ही इंतजार है। क्य्ाोंकि इनसे वरिष्ठ राजीव माथुर तो पुलिस अकादमी में संचालक बन चुके हैं ऐसे में वे छत्तीसगढ लौटेंगे ऐसा लगता नहीं है।
य्ो हो क्य्ाा रहा है?
छत्तीसगढ राज्य्ा बनने के बाद पूर्व मुख्य्ामंत्र्ाी अजीत जोगी के शासनकाल में ननकीराम कंवर (अभी गृहमंत्र्ाी) से कोरबा जिले के शराब ठेकेदार के गुर्गों द्वारा बदतमीजी की चर्चा विधानसभा में भी हुई थी वहीं अब गृह एवं जेल विभाग के संसदीय्ा सचिव विजय्ा बघेल ने जुल्म और अत्य्ााचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिय्ो ’फिल्म‘ को माध्य्ाम बनाय्ाा है वे जानते हैं कि जब गृहमंत्र्ाी की आवाज पुलिस मुख्य्ाालय्ा में अनसुनी की जाती है तो वे तो कहीं नहीं लगते हैं। छत्तीसगढ में एक फिल्म बन रही है ’माटी के लाल‘ इसमें विधाय्ाक विजय्ा बघेल सरपंच की भूमिका निभा रहे हैं। फिल्म में वे नशे के खिलाफ जंग लडने वाले एक आदर्शवादी सिद्घांतों पर चलने वाले सरपंच की भूमिका में है जिन्हें जुबान बंद करने शराब ठेकेदार पैसों का लालच देता है पर वे अपने सिद्घांतों पर अडिग रहते हैं। उनके पुत्र्ा की भूमिका में एसएमएस के रूप में कभी राजधानी में चर्चित पुलिस अधिकारी शशिमोहन सिंह भी उस फिल्म में दिखाई देंगे। वे फिल्म में सरपंच के पुत्र्ा बने हैं। वैसे छत्तीसगढ नक्सली प्रभावित राज्य्ा में जो चल रहा है वह भी चर्चा में नहीं है। पुलिस मुखिय्ाा विश्वरंजन, लेखक, समीक्षक, आलोचक, कवि कलाकार हैं, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्य्ाक्ष हैं। (निय्ामानुसार सरकार से अनुमति ली है य्ाा नहीं य्ाह पता नहीं चला है।) उन्हें गृहमंत्र्ाी ननकीराम कंवर मुख्य्ामंत्र्ाी से अनुमति लेकर कारण बताओ नोटिस दे चुके हैं। गृहमंत्र्ाी ननकीराम कंवर को प्रदेश की पुलिस पर विश्वास नहीं है वे एचएम स्क्वॉड बनाकर शराब, जुआ अड्डों पर छापा मरवा रहे हैं, संसदीय्ा सचिव गृह फिल्मों के माध्य्ाम से शराब के खिलाफ जनजागरण चलाने अभिनय्ा कर रहे हैं। पुलिस अधिकारी शशि मोहन सिंह सरकार से छुट्टी लेकर फिल्मों में पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाकर अपना काम चला रहे हैं। एक अफसर अपनी अखिल भारतीय्ा स्तर की नौकरी से त्य्ाागपत्र्ा देकर संविदा निय्ाुक्ति पर कायर््ा कर रहा है। य्ाह बात और है कि उसकी संविदा निय्ाुक्ति पहले हो गई थी और केन्द्र सरकार ने उसका त्य्ाागपत्र्ा पिछले माह ही स्वीकृत किय्ाा है।छत्तीसगढ के मुख्य्ा सचिव जॉय्ा उम्मेन दिल्ली जाते हैं और वहां पत्र्ाकारों से कहते हैं कि वे केन्द्र में आ रहे हैं अपने निचले अधिकारिय्ाों को वे मौका देना चाहते हैं, बहुत दिन छत्तीसगढ में काम कर लिय्ाा। फिर दिल्ली से राय्ापुर लौटते हैं और कहते हैं कि वे केन्द्र में नहीं जा रहे हैं फिर चर्चा चलती है कि वे फिलहाल नहीं जा रहे हैं फिर कहां जाता है कि उनका केन्द्र में जाना तय्ा है आखिर छत्तीसगढ में हो क्य्ाा रहा है?
नेता प्रतिपक्ष!
छत्तीसगढ में नेताप्रतिपक्ष बनने के बाद उनकी राजनीति (?) पर भी प्रश्नचिन्ह ही लगता रहा है। मध्य्ाप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष य्ाा प्रदेश अध्य्ाक्ष सरकार बनने पर मुख्य्ामंत्र्ाी बनता था पर मध्य्ाप्रदेश से ही निय्ाम काय्ादे ग्रहण करने वाले छत्तीसगढ में ऐसा हुआ नहीं। नय्ाा प्रदेश बनने के बाद नंदकुमार साय्ा पहले नेता प्रतिपक्ष बने। उसको लेकर भी पार्टी के भीतर विवाद, बृजमोहन अग्रवाल का निलंबन चर्चा में रहा। जोगी शासनकाल में लाठी चार्ज में साय्ा का पैर फ्रैक्चर होना बैसाखी के सहारे कुछ महीनों चलना भी खबर बना था। पर अगले विस चुनाव में नेता प्रतिपक्ष साय्ा को मुख्य्ामंत्र्ाी जोगी के खिलाफ चुनाव लडवाकर शहीद करने का षड्य्ांत्र्ा चला, विस चुनाव पराजित होकर वे प्रदेश की राजनीति से ही अलग हो गय्ो। विस चुनाव के बाद भाजपा को बहुमत मिला और विधाय्ाकों की खरीद फरोख्त के नाम पर अजीत जोगी को कांगे€स से निलंबित फिर विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ महासमुंद लोस से चुनाव लडने की शर्त पर निलंबन वापसी, विद्याचरण शुक्ल को बतौर भाजपा प्रत्य्ााशी चुनाव समर में उतरना, जोगी से पराजित होना भी अविश्वसनीय्ा घटना ही रही। खैर डॉ.रमन सिंह मुख्य्ामंत्र्ाी बने और महेंद्र कर्मा को नेता प्रतिपक्ष और भूपेश बघेल को उपनेता प्रतिपक्ष (हालांकि इस पद की संवैधानिक मान्य्ाता नहीं) बनाय्ाा गय्ाा और इस विधानसभा में दोनों ही पराजित हो गय्ो। इसके बाद रविन्द्र चौबे को नेता प्रतिपक्ष बनाय्ाा गय्ाा है ओर अब उनको भी हटाने की मुहिम शुरू हो चुकी है। इधर छत्तीसगढ में मोतीलाल वोरा के प्रदेश कांगे€स अध्य्ाक्ष बनने के बाद से कायर््ा समिति को गठन नहीं होना, केवल अध्य्ाक्ष तथा कायर््ाकारी अध्य्ाक्ष बनाने का सिलसिला जारी रखना, केन्द्रीय्ा मंत्र्ाी तथा प्रदेश कांगे€स के प्रभारी नाराय्ाण सामी पर कालिख फेकना भी अविश्वनीय्ा घटना ही रही है। जहां तक भाजपा संगठन की बात है तो अध्य्ाक्ष नंदकुमार साय्ा को प्रदेश की राजनीति से अलग करना, दूसरे अध्य्ाक्ष शिवप्रताप सिंह का बतौर राज्य्ा सभा सदस्य्ा निलंबन, फिर वापसी, एक और अध्य्ाक्ष ताराचंद साहू का पार्टी से निष्काषन, एक और अध्य्ाक्ष विष्णुदेव साय्ा की विधानसभा चुनाव में पराजय्ा भी बडी खबर रही। छत्तीसगढ भाजपा के पितृपुरुष स्व. लखीराम अग्रवाल के पुत्र्ा अमर अग्रवाल की मंत्र्ािमंडल से छुट्टी फिर वापसी, प्रदेश के वरिष्ठ सासंद रमेश बैस की प्रदेश भाजपा अध्य्ाक्ष बनने की इच्छा के विपरीत रामसेवक पैकरा को प्रदेश भाजपा अध्य्ाक्ष बनाना भी अविश्वसनीय्ा घटना ही रही।
और अब बस
(1)भाजपा के एक बुजुर्ग नेता से किसी ने ’कमल विहार‘ य्ाोजना के विषय्ा में पूछा। उन्होंने जवाब दिय्ाा कुछ लोग कमल (भाजपा का चुनाव चिन्ह) को बदनाम करने ही य्ाह मुद्दा उछाल रहे हैं इसके पीछे विपक्ष की भी साजिश है।(2)पप्पू फरिश्ता पर पुलिस तथा कांगे€स ने 5-5 हजार के इनाम घोषित किय्ो हैं। जब ’कुरैशी‘ और ’शाह‘ और ’दिग्विजय्ा सिंह‘ से कुछ कांगे€सिय्ाों ने ही दुव्यर््ावहार किय्ाा था। उस समय्ा य्ो कांगे€सी कहां थे? उस समय्ा तो इनकी पार्टी की ही सरकार थी।(3)भाजपा के राष्ट्रीय्ा स्तर के बडे नेता के रिश्तेदार ’बडा पोल्ट्रीफार्म‘ चला रहे हैं एक दूसरे बडे नेता की पत्नी के ’एनजीओ‘ को प्रदेश में एक बडा काम सौंपा गय्ाा है और कांगे€स एक-दूसरे पर कालिख पोतने में ही लगी है।-----------





आइना ए छत्तीसगढ़

हालात ने अजीब तमाशे दिखाये हैं
रिश्ते बदल गये ·भी रास्ते बदल गये
छत्तीसगढ़ राज्य ·ा दसवां स्थापना वर्ष हाल ही में मनाया गया है। इन 10 सालों में ·ई अविश्वनीय बातें प्र·ाश में आती रही है। लगता है ·ि छत्तीसगढ़ में घटित घटनाओं ·ो ले·र ही ए· अहिंदीभाषी अफसर ने ‘विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ ·ा स्लोगन तैयार ·र डॉ. रमन सिंह से स्वी·ृति भी ले ली और राज्योत्सव पर वह स्लोगन चर्चा में भी रहा। वैसे अविश्वसनीय घटनाओं ·े बीच विश्वास पैदा ·रने ·ी जरूरत तो थी ही! राज्य बनते समय ·भी प्रधानमंत्री ·े बाद ·ी स्थिति में रहने वाले पूर्व ·ेन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने तत्·ालीन गृहमंत्री लाल·ृष्ण आडवाणी से भी मुख्यमंत्री बनाने ·ा अनुरोध ·िया पर वे तैयार नहीं हुए। दिग्विजय सिंह से उन·े फार्म हाऊस में दुव्र्यवहार भी चर्चा में रहा। विद्याचरण शुक्ल, श्यामा चरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा ·े रहते ए· पूर्व नौ·रशाह अजीत जोगी ·ो छत्तीसगढ़ ·ा पहला मुख्यमंत्री बनाया गया था यह क्या उस समय विश्वसनीय था? छत्तीसगढ़ राज्य ·ा निर्माण होने ·ो 10 साल हो चु·े हैं, अजीत जोगी ·े बाद डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री बने हैं। लगातार दूसरी बार भाजपा ·ी सर·ार बनी और पांच साल ·ा ए· ·ार्य·ाल पूरा ·रने ·े बाद दूसरी बार सर·ार बना·र पुन: मुख्यमंत्री बन·र डॉ. रमन सिंह ने भी रि·ार्ड बनाया है। वैसे भाजपा सर·ार ·े मुख्यमंत्रियों में गुजरात ·े नरेंद्र मोदी ·े बाद डॉ. रमन सिंह ·ा ·्रम दूसरे नंबर में है। जहां त· राज्यपालों ·ा सवाल है तो 10 साल ·े ·ार्य·ाल में 4 राज्यपाल तैनात हो चु·े हैं। दिनेश नंदन श्रीवास्तव, ·े एम सेठ, नरसिम्हन ·े बाद शेखर दत्त ·ी यहां नियुक्ति हुई है। दिनेशनंदन श्रीवास्तव तथा ई एस एल नरसिम्हन जहां पूर्व में आईपीएस अफसर रह चु·े थे तो ·े एम सेठ सैन्य अधि·ारी थे तो शेखर दत्त पूर्व आईएएस अफसर रह चु·े हैं। शेखर दत्त तो अविभाजित मध्यप्रदेश में रायपुर संभाग ·े ·मिश्नर भी रह चु·े हैं वहीं छत्तीसगढ़ वि·ास प्राधि·रण से भी जुड़े रहे हैं।विस अध्यक्ष!छत्तसगढ़ ·े पहले विधानसभ अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ला ·ा असमय निधन हो गया। भाजपा ·ी सर·ार बनने से वहले बनवारी लाल अग्रवाल (भाजपा) उपाध्यक्ष बने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिया और धर्मजीत सिंह विस उपाध्यक्ष बने।पहली बार छत्तीसगढ़ में ·ांगे्रस ·ा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष बनने ·ी परंपरा शुरू हुई जो अनवरत जारी है। भाजपा ·ी पहली सर·ार बनी तो विधानसभा अध्यक्ष ·ा रदायित्व प्रेमप्र·ाश पांडे तथा उपाध्यक्ष ·ा दायित्व बुर्जुग राजनेता बद्रीधर दीवान ने सम्हाला। पर विधानसभा चुनाव में बतौर विस अध्यक्ष चुनाव लडऩे वाले प्रेमप्र·ाश पांडे हार गये यह परिणाम भी अविश्वसनीय रहा। बद्रीधर दीवान चुनाव तो जीत गये पर विस उपाध्यक्ष बनने तैयार नहीं हुए। छत्तीसगढ़ राज्य ·े तीसरे विस अध्यक्ष धरमलाल ·ौशि· बने तो उपाध्यक्ष नारायण सिंह चंदेल ·ो बनाया गया। गृहमंत्री!छत्तीसगढ़ राज्य बनने ·े बाद पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ·े ·ार्य·ाल में नंद·ुमार पटेल पहले गृहमंत्री रहे तो डॉ. रमन सिंह ·े मुख्यमंत्री बनने ·े बाद सर्वश्री बृजमोहन अग्रवाल, रामविचार नेताम ·े बाद नन·ीराम ·ंवर गृहमंत्री बने हैं। सामान्य वर्ग से मुख्यमंत्री बने डॉ. रमन सिंह ·े साथ सामान्य वर्ग से ही गृहमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ·ो बनाया गया फिर उन्हें हटा·र आदिवासी वर्ग से रामविचार नेताम फिर नन·ीराम ·ंवर ·ो गृहमंत्रालय सौंपा गया पर जिस तरह से आदिवासी अंचल बस्तर में नक्सलवाद और पनपा है, 76 सी आरपीएफ जवानों ·ा नक्सलियों द्वारा नरसंहार ·िया गया, पुलिस अधीक्ष· विनोद चौबे ·ी नक्सलियों द्वारा हत्या ·ी गई, बारुद ·ी सबसे बड़ी लूट नक्सलियों ने ·ी, पुलिस ·ा इतना बड़ा अमला रहने ·े बाद भी ‘एचएम स्क्वॉड’ गठित ·रना पड़ा, गृहमंत्री नन·ीराम ·ंवर ·ो जिस तरह डीजीपी विश्वरंजन अक्सर चुनौती देते दिखाई देते हैं दोनों ·े बीच मतभेद मीडिया ·े सामने आते रहते हैं वह भी ·म से ·म पुलिस ·ी ·ार्यप्रणाली ·े लिये विश्वसनीय तो नहीं ·हा जा स·ता है। पूर्व गृहमंत्री एवं जेल मंत्री रामविचार नेताम ·े ·ार्य·ाल में नक्सली आतं· बढ़ा तो बढ़ा साथ ही जिस तरह दंतेवाड़ा में नक्सलियों ·ा सबसे बड़ा जेलबे्र· हुआ उसमें ·ेवल जेल ·े डिप्टी जेलर ·ो मुजरिम बनाया गया, उस·ा नार्·ों टेस्ट भी नहीं हुआ तथा उस पर राजद्रोह ·ा आरोप लगा·र उस·ी नियमानुसार राज्य सर·ार से पुष्टिï नहीं ·ी गई और न्यायालय द्वारा उसे छोडऩा पड़ा यह भी ·म चर्चा में नहीं रहा क्या यह पुलिस ·ी ·ार्यप्रणाली ·ी विश्वसनीयता ·ी झल· नहीं है। मुख्यसचिव और डीजीपीछत्तीसगढ़ राज्य बनने ·े बाद पहले डीजीपी मोहन शुक्ल बने फिर पी ·े दास, अशो· दरबारी, आर एस यादव बने फिर ओ पी राठौर, विश्वरंजन डीजीपी बने, वैसे संत·ुमार पासवान, अनिल नवानी भी डीजीपी ·ा ·ार्यभार सम्हाल चु·े हैं। जहां मत· मुख्य सचिव ·ा सवाल है तो अरूण ·ुमार, ए ·े विजयवर्गीय, एस ·े मिश्रा, आर पी बगई, शिवराज सिंह, जाय उम्मेन ·ो मुख्य सचिव बनाया बी ·े एस रे ·ी उपेक्षा ·र 5 साल जूनियर उम्मेन ·ो मुख्य सचिव बनाना भी विश्वसनीय निर्णय नहीं ·हा जा रहा था। खैर अब जाय उम्मेन ·ी भी चला-चली ·ी बेला है। नारायण सिंह, सरजियस मिंज, सुनील ·ुमार ·तार में है। तो विश्वरंजन ·ी भी ज्यादा दिन ‘सर·ार’ से बनेगी ऐसा लगता नहीं है। वैसे संत·ुमार पासावान और अनिल नवानी भी अब डीजी बन चु·े हैं और इन दोनों अफसरों ·ो डीजीपी बनने ·ा ही इंतजार है। क्यों·ि इनसे वरिष्ठï राजीव माथुर तो पुलिस अ·ादमी में संचाल· बन चु·े हैं ऐसे में वे छत्तीसगढ़ लौटेंगे ऐसा लगता नहीं है। ये हो क्या रहा है?छत्तीसगढ़ राज्य बनने ·े बाद पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ·े शासन·ाल में नन·ीराम ·ंवर (अभी गृहमंत्री) से ·ोरबा जिले ·े शराब ठे·ेदार ·े गुर्गों द्वारा बदतमीजी ·ी चर्चा विधानसभा में भी हुई थी वहीं अब गृह एवं जेल विभाग ·े संसदीय सचिव विजय बघेल ने जुल्म और अत्याचार ·े खिलाफ आवाज बुलंद ·रने ·े लिये ‘फिल्म’ ·ो माध्यम बनाया है वे जानते हैं ·ि जब गृहमंत्री ·ी आवाज पुलिस मुख्यालय में अनसुनी ·ी जाती है तो वे तो ·हीं नहीं लगते हैं। छत्तीसगढ़ में ए· फिल्म बन रही है ‘माटी ·े लाल’ इसमें विधाय· विजय बघेल सरपंच ·ी भूमि·ा निभा रहे हैं। फिल्म में वे नशे ·े खिलाफ जंग लडऩे वाले ए· आदर्शवादी सिद्घांतों पर चलने वाले सरपंच ·ी भूमि·ा में है जिन्हें जुबान बंद ·रने शराब ठे·ेदार पैसों ·ा लालच देता है पर वे अपने सिद्घांतों पर अडिग रहते हैं। उन·े पुत्र ·ी भूमि·ा में एसएमएस ·े रूप में ·भी राजधानी में चर्चित पुलिस अधि·ारी शशिमोहन सिंह भी उस फिल्म में दिखाई देंगे। वे फिल्म में सरपंच ·े पुत्र बने हैं। वैसे छत्तीसगढ़ नक्सली प्रभावित राज्य में जो चल रहा है वह भी चर्चा में नहीं है। पुलिस मुखिया विश्वरंजन, लेख·, समीक्ष·, आलोच·, ·वि ·ला·ार हैं, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान ·े अध्यक्ष हैं। (नियमानुसार सर·ार से अनुमति ली है या नहीं यह पता नहीं चला है।) उन्हें गृहमंत्री नन·ीराम ·ंवर मुख्यमंत्री से अनुमति ले·र ·ारण बताओ नोटिस दे चु·े हैं। गृहमंत्री नन·ीराम ·ंवर ·ो प्रदेश ·ी पुलिस पर विश्वास नहीं है वे एचएम स्क्वॉड बना·र शराब, जुआ अड्डïों पर छापा मरवा रहे हैं, संसदीय सचिव गृह फिल्मों ·े माध्यम से शराब ·े खिलाफ जनजागरण चलाने अभिनय ·र रहे हैं। पुलिस अधि·ारी शशि मोहन सिंह सर·ार से छुट्टïी ले·र फिल्मों में पुलिस अधि·ारी ·ी भूमि·ा निभा·र अपना ·ाम चला रहे हैं। ए· अफसर अपनी अखिल भारतीय स्तर ·ी नौ·री से त्यागपत्र दे·र संविदा नियुक्ति पर ·ार्य ·र रहा है। यह बात और है ·ि उस·ी संविदा नियुक्ति पहले हो गई थी और ·ेन्द्र सर·ार ने उस·ा त्यागपत्र पिछले माह ही स्वी·ृत ·िया है।छत्तीसगढ़ ·े मुख्य सचिव जॉय उम्मेन दिल्ली जाते हैं और वहां पत्र·ारों से ·हते हैं ·ि वे ·ेन्द्र में आ रहे हैं अपने निचले अधि·ारियों ·ो वे मौ·ा देना चाहते हैं, बहुत दिन छत्तीसगढ़ में ·ाम ·र लिया। फिर दिल्ली से रायपुर लौटते हैं और ·हते हैं ·ि वे ·ेन्द्र में नहीं जा रहे हैं फिर चर्चा चलती है ·ि वे फिलहाल नहीं जा रहे हैं फिर ·हां जाता है ·ि उन·ा ·ेन्द्र में जाना तय है आखिर छत्तीसगढ़ में हो क्या रहा है?नेता प्रतिपक्ष!छत्तीसगढ़ में नेताप्रतिपक्ष बनने ·े बाद उन·ी राजनीति (?) पर भी प्रश्नचिन्ह ही लगता रहा है। मध्यप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष या प्रदेश अध्यक्ष सर·ार बनने पर मुख्यमंत्री बनता था पर मध्यप्रदेश से ही नियम ·ायदे ग्रहण ·रने वाले छत्तीसगढ़ में ऐसा हुआ नहीं। नया प्रदेश बनने ·े बाद नंद·ुमार साय पहले नेता प्रतिपक्ष बने। उस·ो ले·र भी पार्टी ·े भीतर विवाद, बृजमोहन अग्रवाल ·ा निलंबन चर्चा में रहा। जोगी शासन·ाल में लाठी चार्ज में साय ·ा पैर फै्रक्चर होना बैसाखी ·े सहारे ·ुछ महीनों चलना भी खबर बना था। पर अगले विस चुनाव में नेता प्रतिपक्ष साय ·ो मुख्यमंत्री जोगी ·े खिलाफ चुनाव लड़वा·र शहीद ·रने ·ा षडï्यंत्र चला, विस चुनाव पराजित हो·र वे प्रदेश ·ी राजनीति से ही अलग हो गये। विस चुनाव ·े बाद भाजपा ·ो बहुमत मिला और विधाय·ों ·ी खरीद फरोख्त ·े नाम पर अजीत जोगी ·ो ·ांगे्रस से निलंबित फिर विद्याचरण शुक्ल ·े खिलाफ महासमुंद लोस से चुनाव लडऩे ·ी शर्त पर निलंबन वापसी, विद्याचरण शुक्ल ·ो बतौर भाजपा प्रत्याशी चुनाव समर में उतरना, जोगी से पराजित होना भी अविश्वसनीय घटना ही रही। खैर डॉ.रमन सिंह मुख्यमंत्री बने और महेंद्र ·र्मा ·ो नेता प्रतिपक्ष और भूपेश बघेल ·ो उपनेता प्रतिपक्ष (हालां·ि इस पद ·ी संवैधानि· मान्यता नहीं) बनाया गया और इस विधानसभा में दोनों ही पराजित हो गये। इस·े बाद रविन्द्र चौबे ·ो नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है ओर अब उन·ो भी हटाने ·ी मुहिम शुरू हो चु·ी है। इधर छत्तीसगढ़ में मोतीलाल वोरा ·े प्रदेश ·ांगे्रस अध्यक्ष बनने ·े बाद से ·ार्य समिति ·ो गठन नहीं होना, ·ेवल अध्यक्ष तथा ·ार्य·ारी अध्यक्ष बनाने ·ा सिलसिला जारी रखना, ·ेन्द्रीय मंत्री तथा प्रदेश ·ांगे्रस ·े प्रभारी नारायण सामी पर ·ालिख फे·ना भी अविश्वनीय घटना ही रही है। जहां त· भाजपा संगठन ·ी बात है तो अध्यक्ष नंद·ुमार साय ·ो प्रदेश ·ी राजनीति से अलग ·रना, दूसरे अध्यक्ष शिवप्रताप सिंह ·ा बतौर राज्य सभा सदस्य निलंबन, फिर वापसी, ए· और अध्यक्ष ताराचंद साहू ·ा पार्टी से निष्·ाषन, ए· और अध्यक्ष विष्णुदेव साय ·ी विधानसभा चुनाव में पराजय भी बड़ी खबर रही। छत्तीसगढ़ भाजपा ·े पितृपुरुष स्व. लखीराम अग्रवाल ·े पुत्र अमर अग्रवाल ·ी मंत्रिमंडल से छुट्टïी फिर वापसी, प्रदेश ·े वरिष्ठï सासंद रमेश बैस ·ी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने ·ी इच्छा ·े विपरीत रामसेव· पै·रा ·ो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाना भी अविश्वसनीय घटना ही रही।और अब बस(1)भाजपा ·े ए· बुजुर्ग नेता से ·िसी ने ‘·मल विहार’ योजना ·े विषय में पूछा। उन्होंने जवाब दिया ·ुछ लोग ·मल (भाजपा ·ा चुनाव चिन्ह) ·ो बदनाम ·रने ही यह मुद्दा उछाल रहे हैं इस·े पीछे विपक्ष ·ी भी साजिश है।(2)पप्पू फरिश्ता पर पुलिस तथा ·ांगे्रस ने 5-5 हजार ·े इनाम घोषित ·िये हैं। जब ‘·ुरैशी’ और ‘शाह’ और ‘दिग्विजय सिंह’ से ·ुछ ·ांगे्रसियों ने ही दुव्र्यवहार ·िया था। उस समय ये ·ांगे्रसी ·हां थे? उस समय तो इन·ी पार्टी ·ी ही सर·ार थी।(3)भाजपा ·े राष्टï्रीय स्तर ·े बड़े नेता ·े रिश्तेदार ‘बड़ा पोल्ट्रीफार्म’ चला रहे हैं ए· दूसरे बड़े नेता ·ी पत्नी ·े ‘एनजीओ’ ·ो प्रदेश में ए· बड़ा ·ाम सौंपा गया है और ·ांगे्रस ए·-दूसरे पर ·ालिख पोतने में ही लगी है।—————------

Sunday, August 29, 2010

आइना ए छत्तीसगढ़

आइना ए छत्तीसगढ़
चंद रिश्तों ·े खिलौने हैं जो हम खेलते हैं
वर्ना सब जानते हैं ·ौन यहां ·िस·ा है!

अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राजनीति में शुक्ल परिवार ·ा ·ाफी नाम है। हालां·ि विद्याचरण शुक्ल ·ेन्द्र ·ी राजनीति ·रते रहे और उन·े अग्रज पं. श्यामाचरण शुक्ल ने राज्य ·ी ही राजनीति ·ी। छत्तीसगढ़ बनने ·े बाद श्यामा-विद्या भैया राजनीति ·े उस उफान त· नहीं पहुंच स·े जहां त· उन·े पहुंचने ·ी संभावना थी। बहरहाल आज·ल शुक्ल बंधुओं ·ी राजनीति विरासत ·ो अमितेष शुक्ल आगे बढ़ा रहे हैं। वैसे लोग अभी भी ·हने से परहेज नहीं रखते हैं ·ि यदि अमितेष अपनी जिद में श्यामा भैया से राजिम विधानसभा ·ी सीट खाली नहीं ·रवाते, श्यामा भैया यदि छत्तीसगढ़ राज्य ·ी स्थापना ·े समय विधाय· रहते तो उन्हें मुख्यमंत्री बनने से ·ोई रो· नहीं स·ता था खैर राजनीति में अगर-मगर ·ी बात नहीं होती है। बहरहाल नया राज्य बना, अमितेष उस समय राजिम से विधाय· थे और श्यामाचरण शुक्ल ·े उत्तराधि·ारी थे सो उन्हें छत्तीसगढ़ ·े प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी मंत्रिमंडल में स्थान मिला। वैसे अमितेष अभी भी युवा होने ·े बावजूद पुरानी चीजों से ·ाफी प्रेम ·रते हैं। उन·े घर में अभी भी ·ई पुरानी ·ला·ृतियां, पेंटिंग्स तो है ही साथ ही ‘जगुआर ·ार’ भी उन·ी अभी भी पसंदीदा है। अपने समय में फेरारी ·ार ·ा रूतबा रखने वाली इस ‘जगुआर ·ार’ ·ो सन् 1954 में पं.श्यामाचरण शुक्ल ने राष्टï्रपति भवन में हुई नीलामी में 10 हजार रुपए में खरीदा था। यह ·ार श्यामा भैया ·ो भी ·ाफी पसंद थी और यह उन·े ·ई दौरे ·ी हमसफर होने ·े ·ारण यादगार भी है। वैसे इस ·ार ·े पाट््स आसानी से नहीं मिलते हैं। उस समय इस मॉडल ·ी ·ेवल 7 ·ारें ही भारत में बि·ी थी और उनमें से ·ेवल 3 अभी बची हैं और अमितेष शुक्ला अभी भी ·भी-·भार इस ·ार से सैर ·रने नि·लते हैं। वैसे उन·े ·ुछ समर्थ· ही मानते हैं ·ि यदि श्यामा भैया ·ी विरासत अमितेष ·ो सम्हालना है तो राजनीति में भी ‘पापा’ ·े पदचिन्हों पर ही चलना होगा। क्यों·ि अभी अमितेष ·ी स्वयं ·ी राजनीति· पहचान नहीं बन स·ी है उन्हें श्यामाचरण शुक्ल ·े पुत्र और विद्याचरण शुक्ल ·े भतीजे ·े रूप में ही पहचान मिली हुई है। खैर हाल ही में प्रदेश ·ांगे्रस प्रतिनिधि ·े रूप में विद्याचरण शुक्ल ·ी तरफ से उन·ी बेटी ·ा नाम आगे बढ़ा है और पिछले विस चुनाव में भी टि·ट ·े लिये उन·ा नाम उछला था। इसलिये अमितेष ·ो अब अपनी स्वयं ·ी पहचान बनाना और भी जरूरी हो गया है।
आशा ·ी ‘·िरण’!
भाजपा और ·ांगे्रस ·ी लड़ाई नगर निगम में खुल·र देखने ·ो मिल रही थी पर अब तो ·ांगे्रस ·े भीतर ही गुटबाजी ·ा माहौल बन रहा है। ·ांगे्रस ·े स्थायी समिति ·े सदस्य लखवंत सिंह गिल अब सीधे तौर पर महापौर ·िरणमयी नाय· ·े खिलाफ मोर्चा खोल चु·े हैं। छत्तीसगढ़ ·ी राजधानी रायपुर में नगर निगम अब शह और मात ·ा अखाड़ा बन गया है। ·ांगे्रस ·ी महापौर ·िरणमयी नाय·, सभापति तथा भाजपा नेता संजय श्रीवास्तव तथा निगम आयुक्त संजय चौधरी तीन ·ेन्द्र बन चु·े हैं और निर्वाचित पार्षद ही नहीं समझ पा रहे हैं ·ि ·िस ·े पास जाएं तो आमजनता ·ी हालत तो आसानी से समझी जा स·ती है। असल में निगम आयुक्त ओ पी चौधरी सीधे मंत्री राजेश मूणत ·े निर्देश पर ·ाम ·रते हैं तो निगम सभापति संजय श्रीवास्तव ·ो प्रदेश ·े वरिष्ठï मंत्री तथा नगर विधाय· बृजमोहन अग्रवाल ·ा आशीर्वाद प्राप्त है। जहां त· महापौर ·िरणमयी नाय· ·ा सवाल है तो महापौर बनने ·े पहले उन्होंने सभी बड़े नेता अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, डॉ. चरणदास महंत, सत्यनारायण शर्मा, धनेंद्र साहू ·ा आशीर्वाद लिया था पर महापौर बनने ·े बाद लगता है ·ि उन्हें ·िसी से आशीर्वाद लेने ·ी जरूरत नहीं रह गई है। अब तो ·ुछ बड़े ·ांगे्रसी नेता भी ·हते हैं ·ि महापौर ·ो तो ‘·ांगे्रस’ ·ी ही जरूरत नहीं है। दरअसल महापौर ·े शपथ ग्रहण समारोह से राजनीति शुरू हुई ओर पार्षदों ·ा बहुमत होने ·े बाद भी (·ुछ निर्दलीय मिला·र) भाजपा ·े संजय श्रीवास्तव सभापति बन गये। ·ुछ ·ांगे्रसी पार्षदों ने भीतरघात ·िया था? संगठन ने ·ुछ ·ी ‘मोबाइल ·ाल डिटेल्स’ भी नि·ाली पर बाद में ·ुछ नहीं हुआ। भाजपा ·ी प्रदेश में सर·ार ·े बाद भी भाजपा ·ा सभापति बनने ·े बाद ·िरण ने ·हा था ·ि अपनी मर्जी से निगम ·ी सर·ार चलाएंगी और जवाब में सभापति ने ·हा था निगम ·िसी ·ी जागीर नहीं है। ·भी महापौर ·हती हैं ·ि सभापति ·ी हैसियत ए· क्लर्· ·ी होती है। निगम ·मिश्नर उन·े अधीन अधि·ारी है। खैर ·ांगे्रस और भाजपा ·ी राजनीति· लड़ाई ·े चलते राजधानी ·े निवासी स्वयं ·ो ठगा सा महसूस ·रते हैं। लोगों ·ा ·हना है ·ि हमने तो तेलीबांधा में पहले निगम द्वारा तोडफ़ोड़ ·े खिलाफ सड़· तथा न्यायालय जा·र लडऩे वाली ·िरणमयी ·ेो महापौर चुना था पर महापौर बनने ·े बाद तो ·ेवल गरीबों ·े ·ब्जे हटाने में ही उन·ी रुचि दिखाई दें रही है। इधर ·ांगे्रस ·े ·ुछ लोग ·हते हैं ·ि महापौर ने जितने मामलों में जांच ·राई या जांच समिति बनाई ·िसी ·े खिलाफ ·ार्यवाही नहीं हो स·ी है चाहे वह ·ंडम वाहन ·ो अच्छी बता·र डीजल-पेट्रोल ·े घपले ·ा मामला हो या सफाई मजदूर ठे·े ·ा?
·ई योजनाएं लंबित
राजधानी में ·ांगे्रस ·े पास वर्तमान में पूर्व महापौर सर्वश्री स्वरूप चंद जैन, तरुण प्रसाद चटर्जी, संतोष अग्रवाल, उपमहापौर-सभापति गंगाराम शर्मा, इ·बाल अहमद रिजवी, अब्दुल हमीद ·ोटा, गजराज पगारिया मौजूद हैं पर नई-नई पहली बार निगम ·ी राजनीति में स·्रिय महापौर ने इन अनुभवियों से भी सलाह लेने ·ी जरूरत नहीं समझी है। राजधानी में आज भी भूमिगत नाली योजना ·ा ·ार्य अपूर्ण है। तात्यापारा से जयस्तंभ चौ· त· सड़· ·ा चौड़ी·रण, शहर से बारिश में पानी नि·ासी, जल आवर्धन योजना, ओव्हर ब्रिज और फ्लाई ओवर ·ा ·ाम पूरा ·राना, जे एन यू आर एम एम ·े तहत गरीबों ·ो 28 हजार म·ान सुलभ ·राना, नये निगम मुख्यालय भवन ·े निर्माण ·ो पूरा ·राना, यातायात व्यवस्था, अवैध ·ब्जा धारियों ·ा व्यवस्थापन ·रना आदि बा·ी है पर महापौर यानि प्रथम नागरि· तो सर·ारी आयोजनों में ही अधि· दिखाई दे रही हैं। हाल ही में उन·े सबसे ·रीबी तथा वरिष्ठï पार्षद लखवंत सिंह गिल ने एमआईसी से इस्तीफा दे दिया है यही नहीं जब महापौर क्वींस बैटन ·ो थामने ·े ·ार्य·्रम में जम·र हिस्सा ले रही थी तब लखवंत सिंह और ए· और पार्षद पनाग मौनव्रत धारण ·र क्वींस बैटन ·े स्वागत ·े विरोध में धरने में बैठे थे। ·ुल मिला·र अब महापौर ·ो सत्ताधारी दल भाजपा ·े साथ अपने ही ·ुछ ·ांगे्रसी पार्षदों ·े विरोध ·ा सामना ·रना पड़ स·ता है। ·ांगे्रस ·े बड़े नेता तो वैसे भी महापौर ·े व्यवहार से नाराज चल रही रहे हैं।
पीएचक्यू से बाहर!
पुलिस मुख्यालय से अफसरों ·ो बाहर रखने ·ी पुरानी परंपरा भी अनवरत जारी है। पूर्व पुलिस महानिदेश· ओ.पी. राठौर ·े समय से ·ुछ वरिष्ठï पुलिस अफसरों ·ो पुलिस मुख्यालय से बाहर रखने ·ी परंपरा शुरू ·ी गई थी उस समय एडीजी राजीव माथुर ·ो पुलिस मुख्यालय से बाहर रखा गया था। अभी भी पुलिस महानिदेश· विश्वरंजन ·े बाद ·े वरिष्ठï अधि·ारी अनिल नवानी (डीजी होमगार्ड) संत ·ुमार पासवान (डीजी जेल) पुलिस मुख्यालय से बाहर है जब·ि दोनो अफसरों ने बतौर डीजीपी ·ा ·ाम भी सम्हाला है। हाल ही में एडीजी ·े पद पर अंसारी तथा ए. एन. उपाध्याय ·ी पदोन्नति हुई है। एडीजी बना·र अंसारी ·ो तो प्रोसीक्यूसन बनाया गया है वहीं गृहसचिव उपाध्याय ·ो एडीजी बना·र गृह विभाग में ही ओएसडी बनाया गया है यानि दोनो अफसर पुलिस मुख्यालय ·े बाहर ही रहेंगे। अभी ·ी स्थिति में ·ेवल रामनिवास तथा गिरधारी नाय· ही बतौर एडीजी पुलिस मुख्यालय में तैनात है। असल में अंसारी साहब ·ो तो ए·-दो माह पहले ही एडीजी बन जाना था पर उन·ी फाईल न जाने क्यों गृहमंत्री नन·ीराम ·ंवर ने मंगवा ली थी वहीं ए.एन. उपाध्याय ·ो गृह सचिव से पदोन्नत ·र एडीजी ·ो बनाया गया पर उन·ी तैनाती मंत्रालय में ही ओएसडी ·े पद पर ·र दी गई है। नक्सली प्रभावित क्षेत्र में तैनात रहे संत·ुमार पासवान (एसपी बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, डीआईजी तथा आईजी बस्तर) अंसारी (आईजीबस्तर) ए.एन. उपाध्याय (आईजी सरगुजा) आर.सी. पटेल (आईजी सरगुजा)। पुलिस मुख्यालय से बाहर है वहीं ·भी नक्सली क्षेत्र में तैनात नहीं रहे ए· अफसर नक्सली मामलों ·ी ब्रीफिंग पत्र·ारों ·ो ·र रहे हैं। वहीं मुख्यमंत्री , गृहमंत्री तथा डीजीपी ·े सामने 69 नक्सली (बाद में अधि·ांश फर्जी नि·ले)·ा आत्मसमर्पण ·राने वाले ए· अफसर ·ो खेलने ·े लिए खुला छोड़ दिया गया है। वैसे राजधानी में पदस्थ आईजी मु·ेश गुप्ता और एसपी दीपांशु ·ाबरा तो नक्सली प्रभावित क्षेत्र में पहले तैनात रह चु·े हैं। और अब बस(1)प्रदेश ·े ए· बड़बोले अफसर जो नक्सलियों ·े घर में घुस·र मारने ·ी बात ·रते थे आज·ल ·ुछ खामोश है। उन·ा ए· साहित्यि· आयोजन भी इस साल सादा-सादा निपट ही गया। उन·ी खामोशी ·ो ले·र तरह-तरह ·े ·यास लगाये जा रहे हैं। (2)क्वींस बैटन ·ो ·िसी तरह थाम·र लौटे ए· बड़े नेता (आज·ल भूतपूर्व) ने आ·र ·हा ·ि आखिर बैटन है क्या? उनसे जब पूछा गया ·ि जब आप जानते नहीं थे तो थामने क्यों चले गये थे। उन·ा ·हना था ·ि मुख्यमंत्री और राज्यपाल जब उसे थामने गये थे तो ·ुछ खास तो था इसलिए हम भी चले गये। (3)महापौर ·िरणमयी नाय· क्वींस बैटन ·े आगमन से ले·र उस·ी विदाई त· ·े ·ार्य·्रमों में शर·त ·ी वहीं उन·े खास समर्थ· (आज·ल नाराज) गुड्डïा भईया क्वींस बैटन ·ो अंग्रेजों ·ी मानसि·ता बता·र मौनव्रत पर बैठे थे। वहीं चर्चा नि·ली ·ी आज·ल बल्लू भैया भी महापौर ·े साथ दिखाई नहीं दे रहे हैं ? (4)मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह हमेशा गर्व से जीने ·ी बात ·रते है पर अखबारों में उन·ी फोटो में गरदन तिरछी ही प्र·ाशित होती है। लोगों ·ा ·हना है ·ि सीधे आदमी ·ी फोटो तिरछी क्यों? ·िसी ने जवाब दिया ·ि आयुर्वेदि· डाक्टर साहब ·ी नब्ज देखने ·ी आदत ·े ·ारण गरदन तेढ़ी ·रने ·ी आदत बन गई है और मुख्यमंत्री बनने ·े बाद भी जनता ·ी नब्ज टटोलने ·ा ·्रम जारी है इसीलिए सीधे आदमी ·ी फोटो तिरछी प्र·ाशित होती है।

आइना ए छत्तीसगढ़

आइना ए छत्तीसगढ़
सांस लेने ·ा अगर नाम है जीना साहिर
सांस लेने ·े भी अंदाज बदलते रहिये
भारत ·ी आबादी वर्तमान में बेलगाम दर से बढ़ रही है, बढ़ते ही जा रही है। संयुक्त राष्टï्र सामाजि· एवं आर्थि· आयोग ने अनुमान व्यक्त ·िया है ·ि सन् 2025 त· भारत ·ी आबादी 1.5 अरब हो जाएगी, 2030 त· जनसंख्या ·े 1.53 अरब त· पहुंचने ·ा अनुमान है और 2030 त· भारत आबादी ·े मामले में चीन से आगे नि·ल जाएगा। संयुक्त राष्टï्र जनसंख्या ·ोष हर साल दुनिया ·ी आबादी पर रिपोर्ट पेश ·रता है। इस साल ·ी रिपोर्ट शहरी वि·ास पर है। भारत में शहरी जनसंख्या ·ा ·ुल प्रतिशत 30 से भी ·म है पर सन् 2030 त· यह 40 प्रतिशत पहुंचना अनुमानित है। जाहिर है ·ि देश ·ी शहरी आबादी बढ़ेगी तो शहरों में पेयजल आदि ·ी समस्या और भी भयान· हो जाएगी वही अखास ·ी समस्या भी तेजी से उभरेगी जाहिर है ·ि शहरों ·े आसपास ·ी ·ृषि भूमि प्रभावित होंगी और वहा ·ां·्रीट ·े जंगल उगेंगे। वैसे भारत ·ी बढ़ती जनसंख्या ·े ·ारण पेयजल सं·ट सबसे बड़ी समस्या बन·र निश्चित ही उभरेगा। वर्तमान में भारत में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति ·ी जल उपलब्धता 1525 घनमीटर है जो 2025 त· 1060 घन मीटर रह जाएगी। जाहिर है ·ि ‘छत्तीसगढ़’ ·े धान ·े ·टोरे ·े नाम से चर्चित रहा है पर इस बार मई-जून माह में यहां भी पेयजल सं·ट ·ुछ जगह इतना गहराया ·ि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उन·ी टीम ·ो जनजागरण अभियान चलाने भी सामने आना पड़ा। बहारहाल भारत ·ी बढ़ती जनसंख्या ·े लिये ·ौन-·ौन से राज्य जिम्मेदार हैं इस पर भी चर्चा ·रें। भारत ·ी अथाह जनसंख्या ·े लिये जिम्मेदार राज्यों में आंध्रप्रदेश, ·र्नाट·, तमिलनाडू, ·ेरल आबादी बढ़ाने में 15 प्रतिशत ·ा योगदान ·रती है तो महाराष्टï्र और गुजरात ·ी वृद्घि ·रते हैं। पश्चिम बंगाल और असम ·ी प्रतिशत 9 है तो पंजाब और हरियाणा 4 प्रतिशत है ·ुछ अन्य प्रदेशों ·ा बढ़ाने में योगदान 7 प्रतिशत है। अविभाजित मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ शामिल) बिहार, उत्तरप्रदेश, उडछ़ीसा और राजस्थान ·ी बात ·रें तो आश्चर्य होता है क्यों·ि भारत ·ी ·ुल आबादी ·ी ·ुल 55 प्रतिश जनसंख्या यही हैं और ये राज्य अधि· आबादी ·े ·ारण ‘गरीब राज्यों’ में भी शुमार है। यहां ·ी आम जनता गरीब हैं पर आश्चर्य तो यही है ·ि यहां ·े राजनेताओं पर तथा नौ·रशाहों पर भ्रष्टाचार से बड़े आरोप यहीं लगते रहे हैं। खैर छत्तीसगढ़ राज्य ·ो अपनी जनसंख्या ·ी वृद्घिदर ·ो नियंत्रित ·रने प्रयास ·िये जाने चाहिए। नया राज्य बनने ·े ·ारण यहां मध्यप्रदेश से अधि·ारी-·र्मचारी बड़ी संख्या में आये हैं, नया राज्य बनने ·े ·ारण ·ई सेक्टरों में ·ाम बढ़ा हैं और दूसरे प्रदेशों ·े लोग यहां ·ाम ·ी तलाश में आते रहते हैं। रायपुर में राजधानी बनने सहित आस-पास औद्योगि·ी·रण ·े ·ारण मानव बसाहट बढ़ी है। भविष्य में छत्तीसगढ़ भी आबादी बढऩे से ·ई तरह ·ी समस्याओं से प्रभावित हो स·ता है इस·े लिये अभी से ·ुछ ठोस प्रयास ·िया जाना जरूरी है।जनगणना 2001 ·े आं·ड़ों ·े अनुसार देश ·ी ·ुल जनसंख्या में 80.5 प्रतिशत भारतीय धर्मावलंबी, 13.4 प्रतिशत मुसलमान तथा 2.31प्रतिशत इसाई हैं जब·ि इस·े पहले ·ी जनगणना ·े अनुसार यह आबादी ·्रमश: 82 प्रतिशत 12.1 प्रतिशत तथा 2.3 प्रतिशत थी। नर्सिंग होम एक्ट!शहर में ·ु·ुरमुत्ते ·ी तरह गली, ·ूचों में ·रीब-·रीब 150 नर्सिंग होम स्थापित हैं और अधि·ांश तो निर्धारित मान·ों ·ो भी पूरा नहीं ·रते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ·े सूत्रों ·ी मानें तो प्रदेश में जल्दी ही नर्सिंग होम एक्ट ·े लिये विधानसभा में विधेय· पेश ·िया जाएगा। इस·े लिये मसौदा तैयार हो चु·ा है। विधेय· पारित होने से निजी नर्सिंग होम पर नियंत्रण रखा जा स·ेगा। छत्तीसगढ़ ·ी राजधानी सहित प्रदेश ·े ·ुछ मध्यम तथा छोटे नगरों में भी ·ई नर्सिंग होम खुल चु·े हैं वहीं ·ुछ खुलने ·ी ·तार में हैं। सर्वसुविधायुक्त नर्सिंग होम में मरीजों ·ो सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए पर अब तो दो-चार ·मरों में ही नर्सिंग होम खोले जा चु·े हैं। नर्सिंग होम पर सर·ार ·ी नियंत्रण नहीं होने ·े ·ारण ही आये दिन मरीजों से इलाज ·े नाम पर ·ुछ नर्सिंग होम से मनमानी फीस वसूली ·ी शि·ायतें मिलती रहती हैं यही नही समूचित इलाज ·े अभाव में दम तोडऩे वाले मरीज ·े शव ·ो फीस नहीं देने पर अस्पताल प्रबंधन द्वारा उन·े परिजनों ·ो सौंपने में आना·ानी ·ी खबर भी आम है। ·ुछ जगह तो सामाजि· संस्थाओं द्वारा इसी ·ारण प्रदर्शन तोड़-फोड़ ·ी घटनाएं भी सामने आ चु·ी है। नर्सिंग होम में चौबीसों घंटे डॉक्टर ·ी उपलब्धता होनी चाहिए पर ऐसा होता नहीं है। ·ुछ चि·ित्स· राजधानी ·े ·ई नर्सिंग होम में ए· साथ अपनी सेवाएं देते हैं यही नहीं उन·े नाम भी ·ई नर्सिंग होम में ब·ायदा लगे हुए हैं। वर्तमान में ·ेवल मेडि·ल ·ौसिंल आफ इंडिया में अपना पंजीयन ·रा·र ·ोई भी चि·ित्स· प्रेक्टिस ·ी पात्रता हासिल ·र अपना क्लीनि· या नर्सिंग होम स्थापित ·र लेता है और राज्य सर·ार ·े नियंत्रण में नहीं होने ·े ·ारण सर·ार चाह ·र भी ·ोई ·ार्यवाही नहीं ·र पाती है। अवैध पैथालाजी लेब ·ी स्थापना, मेडि·ल वेस्ट ·ो शहर में ·ही भी फें·ने ·ी भी शि·ायत आसपास ·े लोग ·रते रहते है। वैसे राज्य सर·ार ·े मुखिया डॉ. रमन सिंह स्वयं प्रेक्टिस ·र चु·े हैं, संभवत: उन्ही ·ी पहल पर राज्य सर·ार छत्तीसगढ़ नर्सिंग एक्ट ·ा मसौदा तैयार ·र चु·ी है। इसमें नर्सिंग होम खोलने ·े लिए ·ुछ ऐसे मापदंड तय ·िये जा रहे है जिससे ·ोई भी आसानी से नर्सिंग होम नहीं खोल स·ेगा। सूत्रों ·ी माने तो राज्य शासन ए· ·मेटी बनाएगी जो नर्सिंग होम खोलने ·े आवेदन पर स्पाट में जा·र अवलो·न ·रेगी और अपनी रिपोर्ट तैयार ·रेगी जिसमें नर्सिंग होम ·ी सभी सुविधाओं ·ा जि·्र होगा। ·मेटी ·े संतुष्टï होने ·े बाद ही नर्सिंग होम ·ा रजिस्ट्रेशन हो स·ेगा, खैर देखना यह है ·ि यह विधेय· विधानसभा में ·ब रखा जाता है। मायूस है भाजपाईशास·ीय उप·्रमों निगम-मंडलों ·ी ·ुर्सियों पर ता· लगाये बैठे भाजपा नेताओं ·े सपने टूटते जा रहे है। हाल ही में ·ुछ निगम मंडलों में नियुक्ति ·े बाद यह चर्चा उठी ·ि पहले संगठन में ·ुछ लोगों ·ो समायोजित ·िया जाएगा और बाद में बचे ·ुछ लोगों ·ो निगम मंडलों ·ी ·ुर्सी दी जाएगी। पर बार-बार भाजपा ·े नये अध्यक्ष राम सेव· पै·रा ‘ए· सप्ताह’ में ·ार्य·ारिणी गठन ·ी बात ·रते हैं पर ए· सप्ताह गुजरता है और वे फिर समय बढ़ा देते हैं। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ·े शहर से बाहर जाने या वापसी पर दिखाई देने वाले 2 वें नेताओं ·ो निगम-मंडल ·ी पहली खेप में शामिल नहीं ·रने ·ी भी जम·र चर्चा है। वैसे यह तो लगभग तय है ·ि पहले प्रदेश भाजपा ·ी ·ार्य समिति ·ा गठन होगा और उसी ·े बाद ही यदि हुआ तो निगम मंडल ·ी ·ुर्सी ·ुछ लोगों ·ो दी जाएगी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ·ी मजबूरी यह है ·ि उन्हें अभी त· प्रदेश ·े ·द्दावर नेता तथा पिछड़ा वर्ग ·ा प्रतिनिधित्व ·रने वाले रमेश बैस ·ी तरफ से उन·े समर्थ·ों ·े नाम ही नहीं मिले हैं इधर इतने अधि· नेताओं ·ा पद देने ·ा दबाव है ·ि पै·रा जी परेशान है ·ि ·िसे शामिल ·रें ·िसे नहीं? पापुनि: शर्मा जी जांच ·राएंगे?40 लाख ·ी सर·ार ·ो चपत देने वाला पाठ्यपुस्त· निगम अभी भी नहीं चेता है। अभी भी नवमी गणित ·ी पुस्त· में 727 गलतियां है 2 साल पहले ही इन गलतियों ·ी तरफ ए· इंजनियिर ने ध्यान आ·र्षित ·राना था पर पापुनि और एससीईआरटी ने उन·ी बात पर ध्यान देने ·ी जरूरत नहीं समझी यदि ध्यान दिया गया होता तो फिर से पुस्त· प्र·ाशित ·रने ·ी जरूरत नहीं पड़ती। खैर पापुनि ने नवनिर्वाचित अध्यक्ष अशो· शर्मा ·ा ·हना है ·ि पुरानी ·िताबों ·ो मंगाया जा रहा है। पापुनि ·ो जो मटेरियल दिया जाता है उसी में छपाई ·राई जाती है। और शर्मा जी आप तो इस निगम में नये आये हैं आप क्या जांच ·रायेंगे ·ि सन 2007 सतनामी समाज ·े गुरू ·े विषय में हिंदी ·ी पुस्त· में उन·ी गरिमा ·े विपरीत प्र·ाशन हो गया था। सतनामी समाज आंदोलित हुआ था, विधानसभा में मामला उठा तो गलतियां सुधारने ·ा आश्वासन दिया गया। पहले उस पुस्त· ·ा पन्ना बदला गया, फिर अध्याय ही बदला गया और फिर पुरी पुस्त· ही नई प्र·ाशित ·राई गई। और ·ेवल 40 लाख ·ा ही चूना प्रदेश सर·ार ·ो लगा आखिर इस·े लिए दोषी ·ौन था। टैगोर नगर में पापुनि ·ा ·ार्यालय 42 हजार ·े मासि· ·िराये पर चल रहा था, सामने ही डीएसई ·ार्यालय ·े पास पापुनि ·ो नया भवन बनाने भूखंड भी मिल गया है वहां जल्दी ही भवन भी बन जाएगा फिर आनन-फानन में सवा दो लाख मासि· ·िराये ·ा भवन लेने, ·ार्यालय स्थानांतरित ·रने में खर्च ·रने ·ी क्या जरूरत थी क्या यह आप बता स·ेंगे। पिछले साल ऐन बरसात में ·ागज ·ी आपूर्ति ·रा·र खमतराई में ·िराये ·े और गोदाम लेने ·ी क्या जरूरत थी क्या आपने ·ार्यभार सम्हालने ·े पहले पापुनि ·े ·ागज पुस्त· गोदामों ·ा भौति· सत्यापन ·राया है। खैर अभी तो आप इस क्षेत्र में नये-नये आये है पर घाघ अफसरों और दलाल ·ागज आपूर्ति ·र्ताओं से आप ·ो सावधान ही तो हम ·र स·ते हैं। और अब बस(1)‘डॉक्टर्स डे’ पर डा. रमन सिंह ने ·ुछ डॉक्टरों ·ा सम्मान ·िया और आईएमए द्वारा भूखंड सस्ती दर पर मांगे जाने पर ·हा ·ि उपस्थित ·ुछ लोग तो ·ाफी सक्षम है जो भूखंड भवन भी बना स·ते है यह तो आय·र वाले भी जानते हैं। उन·े इस ·थन से उन·े ·रीबी होने ·ा दावा ·रने वाले डॉक्टर ·ी हालत देखने लाय· थी। (2)आई जी मु·ेश गुप्ता और एसपी दीपांशु ·ाबरा ·े आने ·े बाद पूर्व ·े ए· बड़े साहब ·े खास अफसर परेशान है। ·िसी ने सलाह दी उन्हीं से क्यो बात नहीं ·रते! इस पर ए· ·ी टिप्पणी थी वह खुद ·ो तो बचा नहीं स·े, हमारा भला क्या ·र स·ेंगे। (3) राजधानी में 2 बड़ी खबरें चर्चा में हैं पहली यह है ·ि विजय (रमन) छत्तीसगढ़ से विदा हो गये और दूसरी खबर यह है ·ि अमन (सिंह) छत्तीसगढ़ में ही रह गये क्यों·ि उन·ा इस्तीफा ·ेन्द्र सर·ार ने स्वी·ृत ·र लिया है।

Sunday, May 30, 2010

आइना ए छत्तीसगढ़

आइना ए छत्तीसगढ़
हमने मांगी थी, जरा सी रोशनी घर के लिये
आपने जलती हुई बस्ती के नजराने दिये

छत्तीसगढ़ में बस्तर जल रहा है। नक्सलियों द्वारा आये दिन की जा रही हिंसक वारदात के कारण 'छत्तीसगढ़Ó देश-विदेश की निगाह में है। एक साथ सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बल के 75 जवानों की हत्या, बारूदी सुरंग विस्फोट से यात्री वाहन को उड़ाने की घटना अभी-अभी घटित हुई है वहीं हाल ही में नक्सलियों ने 16 टन अमोनिया नाइटे्रट जैसा विस्फोट लूट (!) लिया है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने तालमेटला में नक्सली वारदात के बाद चूक के लिये राज्य सरकार के 2 आईपीएस अफसरों के खिलाफ कार्यवाही की सिफारिश की है वहीं सीआरपीएफ के 3 अफसरों को हटा दिया गया है। पुलिस मुख्यालय में अफसरों में गुटबाजी का आलम है, एक बार जो नक्सली क्षेत्र में पदस्थ हुआ है उसे 'वहींÓ पदस्थ करने की सरकार की नीति है। राज्य में गुप्तचर शाखा की कमजोरी हर नक्सली हमले में सामने आ रही है पर एडीजी गुप्तचर का स्वीकृत पद रिक्त है। गुप्तचर शाखा का प्रभार आईजीडीएम अवस्थी के पास है तो नक्सली अभियान की जिम्मेदारी आईजी राजेश मिश्रा को सौंपी गई है। सबसे आश्चर्य तो इसी बात का है कि ये दोनों अफसर कभी भी नक्सली क्षेत्र में पदस्थ ही नहीं रहे हैं। बस्तर के पुलिस जिलों की कमान भी दूसरे प्रदेशों के नये-नये अफसरों के पास है। पुलिस के आलाअफसर हों या प्रशासन के वरिष्ठï अफसर वे बस्तर में रात्रिविश्राम करने से परहेज रखते हैं। कुल मिलाकर बस्तर के ग्रामीण अब कहने लगे हैं कि हम तो पहले ही ठीक थे अब तो 2 पाटन के बीच पिसने की मजबूरी है और मौत का एहसास पल-पल में होता है।
राज्य सरकार क्या करेगी?
केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को सिफारिश भेजी है कि दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में 6 अपै्रल को नक्सलियों द्वारा 75 सीआरपीएफ और जिला पुलिस के एक जवान की हत्या के मामले में चूक के लिये बस्तर के आईजी लांगकुमेर (91बैच) और दंतेवाड़ा के पुलिस कप्तान अमरेश मिश्रा (2005 बैच) पर कार्यवाही की जाए। ज्ञात रहे कि रिटायर्ड डीजी (सीआरपीएफ) राममोहन की जांच रिपोर्ट में सीआरपीएफ और प्रदेश पुलिस के बीच बेहतर तालमेल नहीं होने की बात सामने आई है। इधर ताड़मेटला चूक के नाम पर सीआरपीएफ के डीआईजी नलिन प्रभात, कमांडेट विस्ट और एक निरीक्षक संजीव सिंह को पहले ही सीआरपीएफ ने हटा दिया है। गृहमंत्रालय की रिपोर्ट को हालांकि मानने के लिये राज्य सरकार मजबूर नहीं है पर यदि गृहमंत्रालय और डीजीपी की सलाह पर राज्य सरकार यदि केन्द्रीय गृहमंत्रालय की सिफारिश को नहीं मानती है तो उसका असर नक्सली अभियान पर पड़ सकता है। खैर राज्य सरकार का अभी तक जो रवैय्या रहा है वह केन्द्र से सहयोगात्मक ही रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गृहमंत्री पी चिदंबरम से मुलाकात कर पत्रकारों के समक्ष स्पष्टï किया कि नक्सली उन्मूलन में उनके और चिंदबरम के बीच कोई मतभेद नहीं है ऐसे समय में केन्द्रीय गृहमंत्रालय की सिफारिश मानने उन पर पर दबाव भी है। वैसे जानकार कहते हैं कि यदि मुख्यमंत्री ने अपनी इच्छा पर निर्णय लिया तो दोनों आईपीएस अधिकारियों का हटना लगभग तय है। वैसे भी बस्तर के पुलिस महानिदेशक टी जे लांगकुमेर तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के समय से ही बस्तर में तैनात है वे पुलिस कप्तान से आईजी तक का सफर वहां तय कर चुके हैं, वहीं अमरेश मिश्रा तो 2005 बैच के आईपीएस हैं उन्हें हटाना भी कोई बड़ी समस्या सरकार के सामने नहीं है। वैसे दोनों अफसर मूलत: छत्तीसगढ़ के बाहर के निवासी हैं। पहले भी यह चर्चा चल रही थी कि नक्सली प्रभावित बस्तर के पुलिस जिलों में प्रदेश के बाहर के अफसरों की नियुक्ति ही क्यों की जा रही है जबकि इन अफसरों को बस्तर की भौगोलिक परिस्थिति, वहां के रहन-सहन और भाषा आदि की भी जानकारी नहीं है जबकि छत्तीसगढ़ में डीएसपी से लेकर कम से कम आईजी स्तर के छत्तीसगढ़ मूल के निवासी अफसर मौजूद हैं पर उन्हें 'लूपलाइनÓ में रखा जाता है। खैर सवाल यह है कि गृहमंत्रालय की सिफारिश पर राज्य सरकार क्या कदम उठाती है यही देखना है क्योंकि सिफारिश के बाद ही नक्सली अभियान का भविष्य निर्भर करेगा।
चूक पर कार्यवाही क्यों नहीं?
छत्तीसगढ़ में नक्सलप्रभावित क्षेत्रों में केन्द्रीय सुरक्षा बलों के राज्य पुलिस से तालमेल की कमी तो सामने आ ही रही है वहीं प्रदेश पुलिस मुख्यालय की गुटबाजी भी चर्चा में है। वैसे पुलिस महानिदेशक का पद भार विश्वरंजन द्वारा सम्हालने के बाद नक्सलियों ने कई रिकार्ड बनाये हैं और सुरक्षाबल केवल 'चूकÓ की ही बात करती है, नक्सलियों पर 'कायरना हमलाÓ का आरोप मढ़ा जाता है और फिर किसी बड़ी घटना का इंतजार होता है। बस्तर के धूर नक्सली प्रभावित दंतेवाड़ा जिले का नाम अब देश ही नहीं विदेश में भी चर्चा में है।यहां की जेल से 299 नक्सली तथा आम कैदी जेलबे्रक कर फरार हो जाते हैं। यह नक्सलियों का सबसे बड़ा 'जेल ब्रेकÓ था इसमें केवल एक प्रभारी जेलर को आरोपी बनाया जाता है, उसे भी 'राजद्रोहÓ के मामले में न्यायालय इसलिए बरी कर देता है क्योंकि पुलिस ने विधिवत राज्य सरकार से 'राजद्रोहÓ का प्रकरण चलाने अनुमति नहीं ली थी। जेल डीआईजी पीडी वर्मा को प्रथम दृष्टी निलंबित किया गया पर उन्हें आरोप पत्र देने के पहले ही बहाल कर दिया गया आखिर इस मामले में 'चूकÓ किसकी थी?'सेफजोनÓ समझे जाने वाले क्षेत्र में पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे सहित कई सुरक्षाबल के लोगों की नक्सलियों ने हत्या कर दी आखिर कहां किसकी 'चूकÓ थी? कांकेर जिले का एक हवलदार कुछ अन्य लोगों को गश्त के नाम पर पड़ोसी जिला धमतरी के रिसगांव में ले गया और वहां नक्सलियों ने बड़ी वारदात की आखिर इस चूक के लिए कौन जिम्मेदार था? ताड़मेटला में 75 सीआरपीएफ और एक प्रदेश पुलिस के जवान की नक्सलियों ने घेरकर हत्या कर दी, आखिर किस की सूचना पर सीआरपीएफ के जवान वहां गये थे, उनके साथ कितने स्थानीय पुलिस जवान गये थे क्या थाना प्रभारी या उपर के अफसरों को बिना जानकारी दिये सीआरपीएफ के 75 जवान चले गये थे, इस सबसे बड़ी नक्सली द्वारा की गई हत्या के लिये आखिर किसकी 'चूकÓ थी?राष्टï्रीय राज मार्ग 43 में पहले से (संभवत: डामरीकरण के पहले) नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर एक यात्री बस को उड़ा दिया जिसमें करीब 36 लोग मारे गये 15 से अधिक कोया कमांडो, एसपीओ शामिल थे। जब बस्तर में सुरक्षाबल को किसी यात्री बस में सवारी से प्रतिबंध हैं तो ये लोग बस में कैसे सवार हो गये। आम नागरिकों की मौत के लिए आखिर किसने चूक की? उक्त सड़क निर्माण करने वाले ठेकेदार या अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्यवाही की गई?देश में नक्सलियों द्वारा सबसे बड़ 16 टन 'आमोनियम नाईट्रेटÓ की लूट के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है। एक ड्रायवर रूस से आया विस्फोटक लेकर विशाखापटनम से रायपुर/भिलाई के लिए ट्रक लेकर चलता है और उसी हाइवे में जहां कुछ दिन पूर्व ही यात्री बस को नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट से उड़ा दिया था उसी राष्टï्रीय राजमार्ग में 16 टन विस्फोटक 2 नक्सली लेकर चले जाते हैं, ड्रायवर को पावती भी देते हैं अब तो 2 लाख 77 हजार कुछ रुपये देने की पावती देने की भी चर्चा है और गुड़सा उसेण्डी के हस्ताक्षर भी पावती में है इसलिए पुलिस अब ट्रक ड्रायवर और ट्रांसपोर्ट कंपनी को मिली भगत कर नक्सलियों को विस्फोटक आपूर्ति की बात कर रही है? सवाल तो यह भी उठता है कि क्या विस्फोट की खेप गुड़सा उसेंडी ने ही ली थी? और यदि ट्रांसपोर्ट मालिक की मिली भगत थी तो ड्रायवर ने पावती पुलिस को क्यों दी? बहरहाल देश की सबसे बड़ी विस्फोट की लूट पर पुलिस अभी तक कुछ कहने की स्थिति में नहीं है, वैसे इस प्रकरण में लूट हो या आपूर्ति पर पुलिस और गोपनीय विभाग की कलई फिर खुल गई है।
राज्यपाल को बागडोर !
वैसे नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में अब केन्द्र राज्य सरकारों से बंधे बिना सीधे राज्यपाल के जरिये काम कराने पर भी गंभीरता से विचार कर रही है ऐसी स्थिति में नक्सली प्रभावित क्षेत्र की बागडोर किसी एक अफसर को सौंपकर नक्सली विरोधी मोर्चा चलाया जा सकता है। टाईम्स आफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र के महाधिवक्ता ने सलाह दी है कि नक्सली प्रभावित क्षेत्रों के लिए सरकार संविधान पांचवी अनुसूची के तहत आने वाले नक्सल प्रभावित 9 में से 6 राज्यों में राज्य सरकार से बंधे बिना सीधे राज्यपाल के जरिये काम कर सकती है। इस सुझाव के बाद केन्द्र सरकार ऐसी रणनीति बना सकती है जो इस धारणा को गलत साबित कर दे कि नक्सलवाद से लड़ाई में केवल राज्य सरकार की सलाह पर ही राज्यपाल काम कर सकते हैं। इसके साथ ही बरसों से अविकसित रह गये इलाकों का विकास भी कर सकते हैं। ज्ञात रहे कि छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, म.प्र., आंध्र प्रदेश और महाराष्टï्र में संविधान की पांचवी अनुसूची के क्षेत्र अधिकतर जंगल और आदिवासी क्षेत्र हैं जहां विकास की धीमी गति से माओवाद ने अपने पैर जमा लिये हैं। उस अखबार के अनुसार प्रशासन की खामी के कारण फैलते जा रहे नक्सलवाद से चिंतित राष्ट्रपति, केन्द्र सरकार द्वारा इस मुद्दे पर अधिकारिक कानूनी सलाह लेने को कहा था कि क्या राज्यपाल संवैधानिक रूप से उन्हें मिली विवेकाधीन सत्ता का उपयोग करते हुए पांचवे अनुसूचित इलाकों में राज्य सरकारों की सलाह से बाध्य हुए बिना सक्रिय भूमिका निभा सकता है। गृहमंत्रालय के सूत्रों ने तो यहां तक कहा है कि केन्द्र के महाधिवक्ता ने सरकार को इसके समर्थन में सलाह देते हुए कहा है कि राज्यपाल, राज्य सरकारों के परामर्श के बिना अपनी विवेकाधीन सत्ता का उपयोग कर सकते हैं. उन्होंने यह भी स्पष्टï किया है कि नक्सलवाद के साथ विकास को गति को तेज करने की दोहरी नीति को अमल में लाने के लिए राज्यपाल पांचवे अनुसूचित इलाकों में शांति और सुप्रशासन के लिए अधिनियम बनाने भी स्वतंत्र है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि छ.ग. में पांचवी अनुसूची के तहत सरगुजा, बस्तर, रायगढ़, रायपुर, राजनांदगांव, दुर्ग, बिलासपुर और कांकेर क्षेत्र शामिल है।
संयुक्त राष्टï्रसंघ चिंतित
इधर संयुक्त राष्टï्रसंघ ने भारत में नक्सली संगठन द्वारा बच्चों की भर्ती पर चिंता प्रकट की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ बच्चे जबरदस्ती स्कूल से भर्ती कर लिये जाते हैं। सशस्त्र संघर्ष पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट में संयुक्त राष्टï्र संघ ने कहा है कि छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में नक्सलियों द्वारा सशस्त्र संघर्ष में बच्चों का इस्तेमाल बहुत चिंता जनक है। इस अंतर्राष्टï्रीय संगठन ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि अक्टूबर 2009 में नक्सलियों ने अपने सशस्त्र संघर्ष के लिए 5 लड़के लड़कियां देने हर गांववालों को मजबूर किया था। महासचिव वान -का मून द्वारा अपनी रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बात की कई विश्वसनीय रिपोर्ट है कि स्कूलों से लाकर जबरदस्ती बच्चे माओवादी संगठन में भर्ती किये जाते हैं इधर छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन भी पहले ही स्वीकार कर चुके है कि बस्तर में नक्सलियों की पाठशाला चल रही है। खैर नक्सलियों पर अंकुश, दबाव की कितनी भी बाते की जाए पर यह तो स्पष्ट है कि नक्सलियों का जाल कम से कम बस्तर में तो फैल ही चुका है। जब जनगणना कर्मी कई गांवो में प्रवेश नहीं कर पा रहे है तब स्पष्टï है कि वहां के ग्रामीण किस तरह नक्सलियों के दबाव में जीवन जीने मजबूर है। और अब बस
(1)
कभी मुख्यालय में पुलिस के एक आला अफसर का बगलगीर रहने वाला एक आईपीएस अफसर आज-कल जगह-जगह कहने में पीछे नहीं है कि जब तक 'साहबÓ रहेंगे नक्सली समस्या का हल होना असंभव है। वैसे कुछ लोग इस दोनो अफसरों के बीच की मिली-जुली 'नूरा कुश्तीÓ भी कह रहे हैं।
(2)
यदि बस्तर के आईजी लांगकुमेर को हटाया जाता है तो प्रदेश में सबसे योग्य (?) पुलिस अफसर की वहां तैनाती की जा सकती है। सबसे योग्य पुलिस अफसर कौन है यह किसी से छिपा नहीं है।

Saturday, May 22, 2010

आइना ए छत्तीसगढ़

तमाम लोग हवाओं से बात करने लगे
वे कल्पना के परिंदों को मात करने लगे
जो शत्रु थे, वो लड़े युद्घ सामने आकर
हमारे दोस्त ही, पीछे से घात करने लगे

छत्तीसगढ़ की राजनीति में कभी शुक्ल बंधुओं का दबदबा था कहा जाता था कि इनके बिना पत्ता भी नहीं हिलता है। फिर शुक्ल विरोधी गुट अर्जुन सिंह की सरपरस्ती में उभरा उसे दिग्विजय सिंह, अजीत जोगी जैसे नेताओं ने हवा दी और शुक्ल गुट के वंशवादी वृक्ष में मठा डालने का प्रयास किया गया। कांगे्रस की गुटबाजी के कारण ही कभी मध्यप्रदेश की सरकार छत्तीसगढ़ के विधायकों के भरोसे बनती थी उसी छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार 2 बार सरकार बनाने में सफल हो चुकी है। पर भाजपा में भी अब शह और मात खेल तेजी से चल रहा है। विद्याचरण शुक्ल को राज्यसभा टिकट के लिये जोर मारना पड़ रहा है तो छत्तीसगढ़ के सबसे वरिष्ठï सांसद रमेश बैस छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नहीं बन सकें। यह छत्तीसगढ़ में चल रही शह और मात के खेल का बड़ा उदाहरण है। छत्तीसगढ़ जैसे नवजात राज्य में राजनीति और कूटनीति की यह चाल राजनीतिक पार्टी को क्या नुकसान पहुंचाएगी यह तो नहीं कहा जा सकता है पर 'छत्तीसगढ़ का विकासÓ जरूर प्रभावित हो रहा है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी छत्तीसगढ़ का कुछ वर्षों से नेतृत्व नहीं होना भी चितंनीय ही कहा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में कांगे्रस और भाजपा की राजनीति के दो योद्घा आजकल अपनी ही पार्टी में असहज हो गये हैं उनकी अपनी ही पार्टी में आजकल वैसी नहीं चल रही है जैसी चलनी चाहिए। 24 जनवरी 1966 से संसदीय कार्य एवं संचार मंत्रालय में उपमंत्री से अपनी केन्द्रीय राजनीति का आगाज करने वाले विद्याचरण शुक्ल ने गृह राज्य मंत्री, वित्त, रक्षा, सूचना एवं प्रसारण नागरिक आपूर्ति एवं सहकारिता, विदेश, जल संसाधन, संसदीय आदि मंत्रालय का कार्यभार सम्हाल चुके हैं। भारत की राजनीति में एक चर्चित नाम विद्याचरण शुक्ल से देश ही नहीं विदेश में भी लोग परिचित हैं। उन्हें हमेशा कांगे्रस का पर्याय समझा जाता था। वैसे केन्द्र की राजनीति में उन्हें हमेशा 'पीएम के बादÓ का ही दर्जा हासिल था। 1957 में पहली बार बलौदाबाजार लोकसभा से मिनीमाता के साथ वे भी चुने गये थे उस समय 2 सांसद चुनने का प्रावधान था उस समय सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले और उसके निकटवर्ती प्रत्याशी सांसद चुने जाते थे। 1957 के बाद 1962 से महासमुंद लोकसभा चुनाव में उन्होंने खूबचंद बघेल को पराजित किया था उसके बाद1964 का उपचुनाव जीता, 1967 में महासमुंद, 1971 में रायपुर 80, 84,89 से महासमुंद का चुनाव जीतते रहे केवल 1997 का चुनाव रायपुर लोस से विजयी रहे। वे 1977, 1997 का लोस चुनाव रायपुर से पराजित हो गये थे तो नया राज्य बनने के बाद 2004 का लोस चुनाव महासमुंद से बतौर भाजपा प्रत्याशी पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी से हार गये थे। खैर 1989 में राजीव गांधी के खिलाफ बगावत कर जनता दल गठित करने वाले नेताओं के साथ विद्याचरण शुक्ल भी थे। 1989 में वे जद प्रत्याशी के रूप में सांसद बने। पर उन्हें वीपी सिंह के मंत्रिमंडल के स्थान नहीं मिला पर कांगे्रस के समर्थन से चंद्रशेखर की बनी सरकार में वे जरूर कैबिनेट मंत्री बने थे। 1991 में वीसी की कांगे्रस में वापसी होती है और वे नरसिंह राव सरकार में कैबिनेट मंत्री बनते हैं। पर 96 के लोस चुनाव में उन्हें हवाला के नाम पर कांगे्रस प्रत्याशी नहीं बनाती है बाद में हवाला से न्यायालय द्वारा दोष मुक्त किये जाने के बाद 98 में उन्हें कांगे्रस पुन: लोस प्रत्याशी बनाती है लेकिन वे पराजित हो जाते हैं। उसके बाद वे 99 के लोस चुनाव में उनकी जगह श्यामाचरण शुक्ल को प्रत्याशी कांगे्रस पार्टी बनाती है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद विद्याचरण शुक्ल ने पहला मुख्यमंत्री बनने बड़ी लाबिंग की, तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ उनके फार्महाऊस में अशोभनीय घटना भी उन पर भारी पड़ी, अजीत जोगी, दिग्विजय सिंह मजबूत होते गये और वीसी कमजोर। सन् 2004 के लोस चुनाव में वीसी शुक्ल के बतौर भाजपा प्रत्याशी महासमुंद से चुनाव लड़ा और कांगे्रस के अजीत जोगी से पराजित हो गये। उसके बाद वे फिर कांगे्रस में लौट गये पर उनकी स्थिति पहले जैसे नहीं रही। पिछले लोस चुनाव में महासमुंद से लोस टिकट चाहते थे, पर साहू समाज के एक ऐसे व्यक्ति को प्रत्याशी बनाया गया जिसने पहली बार चुनाव लड़ा था। खैर उसकी पराजय भी हुई। अब विद्याचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ से मोहसिना किदवई की रिक्त हो रही राज्य सभा के लिये प्रयासरत हैं वहीं उनका नाम अभी उभरा ही है कि अजीत जोगी भी सक्रिय हो गये हैं। कुल मिलाकर कभी देश, में प्रधानमंत्री के बाद की स्थिति रखने वाले वीसी शुक्ल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, लोकसभा टिकट के बाद अब राज्यसभा की टिकट के लिये संघर्ष कर रहे हैं जबकि कभी उनके आशीर्वाद से सांसद, विधायकों को टिकट मिला करती थी। वे कांगे्रस में तो हैं पर उपेक्षित ही हैं।अब भाजपा की बात करें। छत्तीसगढ़ की राजनीति में जनसंघ से लेकर भाजपा की बात करें तो एक नाम उभरता है रमेश बैस का। ब्राम्ह्मïणपारा वार्ड के पार्षद से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले रमेश बैस मध्यप्रदेश विधानसभा का सफर तय करके केन्द्रीय मंत्री तक का सफर तय कर चुके हैं। 1980 में मंदिर हसौद से विधायक बने रमेश बैस 1984 से 2004 तक लगातार रायपुर लोकसभा टिकट हासिल कर चुनाव लड़ रहे हैं और 89,96,98,99, 2003 और 2008 तक लोकसभा चुनाव में विजयी होते रहे हैं। उनके खाते में पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और पूर्व मुख्यमंत्री पं. श्यामाचरण शुक्ल को भी पराजित करने का श्रेय है। केन्द्र में इस्पात एवं खान, रसायन एवं उर्वरक , सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहने का भी अनुभव है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहले विस चुनाव में उन्हें ही सरकार बनाने की चुनौती देने का जिम्मा देने का प्रयास किया था पर उनकी अनिच्छा के चलते इस अवसर को डा. रमन सिंह ने लपक लिया, सरकार बनी और दूसरी बार डा. रमन सिंह मुख्यमंत्री बने हैं। वैसे प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद रमेश बैस का लगातार राजनीतिक बजन कम होता जा रहा है। प्रदेश की भाजपा सरकार के काम काज पर वे उंगली उठाने में पीछे नहीं है। हाल ही में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में पिछड़ावर्ग की पैरवी कर उस वर्ग का अध्यक्ष बनाने की उनकी मांग भी खारिज हो गई और रामसेवक पैकरा जैसे एक अचर्चित नेता को अध्यक्ष की बागडोर सौंप दी गई। हालांकि रमेश बैक अब कह रहे हैं कि पैकरा के चयन के लिए उनसे राय ली गई? खैर मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और रमेश बैस के बीच मतभेद कई बार सार्वजनिक हो चुका है। प्रशासनिक अधिकारी भी इस बात की पुष्टिï करते हैं तो भाजपा के वरिष्ठï नेता भी।खैर पार्षद, विधायक, सांसद का सफर तक का केन्द्रीय मंत्री बनने वाले विद्याचरण -श्यामाचरण जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों को उन्हीं के गृह नगर में पराजित करने वाले रमेश बैस को या उनके किसी पिछड़ा वर्ग के नेता को भाजपा का अध्यक्ष नहीं बनाना तो यही साबित करता है कि रमेश बैस के मुकाबले डा. रमन सिंह केन्द्रीय नेतृत्व के सामने अधिक मजबूत हैं।
और अब बस
(1)
कुछ वरिष्ठï कांग्रेसी अभी भी कहते है कि जब तक बेनी माधव तिवारी, रम्भू श्रीवास्तव आदि विद्याचरण शुक्ल के निजी सचिव थे तब तक ठीक था जब से राजेन्द्र तिवारी जैसे लोग जुड़े तब से भईया की राजनीतिक पराजय शुरू हो गई।
(2)
भाजपा के नेताओं का कहना है कि यह ठीक है कि राहुल गांधी का भाजपा में कोई विकल्प नहीं है पर छत्तीसगढ़ में रमेश बैस का विकल्प भी कांग्रेस के पास नहीं है हम इसी से खुश हैं।