Friday, August 24, 2012

ना मिले जख्म ना निशान मिले
पर परिन्दे लहु-लुहान मिले
यही संघर्ष है जमीं से मेरा
मेरे हिस्से का आसमान मिले

छत्तीसगढ़ में अगला लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव अगले साल होना है पर प्रदेश सत्ताधारी दल भाजपा तथा कांग्रेस की अभी से तैयारी शुरू हो गई। कांग्रेस का अनुसूचित जाति-जनजाति क्षेत्र में सम्मेलन कर सक्रियता से भाजपा के नीतिकारों के होश उड़ गये है इसलिये भाजपा के एक प्रमुख नेता सौदान सिंह जिला स्तर पर स्वयं जाकर राज्य सरकार के कार्यों की टोह ले रहे है सरकार की नीतियों पर आम राय ले रहे है तो वर्तमान विधायक, सांसद सहित स्वायत्तशासी संस्थाओं के प्रतिनिधियों के कार्य की एक तरह से समीक्षा भी कर रहे हैं। वर्तमान जनप्रतिनिधियों के विषय में टोह भी ले रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदेश में पिछली 2 सरकार बनाने के पीछे सौदान सिंह की विशेष भूमिका रही है यही नहीं विधानसभा और लोकसभा प्रत्याशी चयन में भी उनकी राय को तवोज्जो दी गई थी। पिछली बार भाजपा ने कुछ विधायकों की टिकट काट दी थी और उसका लाभ भी भाजपा को मिला था। हाल ही में भाजपा की डा. रमन सरकार द्वारा सतनामियों का आरक्षण का प्रतिशत कम करके आदिवासियों का आरक्षण प्रतिशत बढ़ाने की घोषणा की गई पर संवैधानिक निर्धारित कोटा से अधिक आरक्षण होने उच्च न्यायालय से स्थगन हो गया है। वैसे यह पहली बार हुआ है कि आरक्षण बढऩे के बावजूद आदिवासी सरकार से नाराज है आरक्षण कम होने से सतनामी समाज का नाराज होना तो स्वाभाविक ही है। राजधानी में प्रदर्शन कर रहे आदिवासियों पर लाठी चार्ज आरक्षण प्रतिशत कम करने, नक्सली प्रभावित क्षेत्र में सलवा जुडूम अभियान चलाने, हजारों आदिवासियों के विस्थापित होने से आदिवासी समाज नाराज है वहीं हाल ही में साप्ताहिक बाजारों में आदिवासियों पर पारंपारिक हथियार लेकर आने पर पाबंदी ने भी आग में घी डाला है। जंगली जानवारों सहित नक्सलियों से रक्षा करने वाले पारंपरिक हथियार, तीर धनुष, कुल्हाड़ी, फरसा आदि पर भी प्रतिबंध लगाने से भी आदिवासी समाज नाराज है।
यह ठीक है कि आदिवासी और सतनामी समाज भाजपा से नाराजगी से कांग्रेसी खेमा उत्साहित है वही हाल ही में कांग्रेस के एक बड़े नेता के अनुसार भाजपा ने चुनाव पूर्व जो दो सर्वेक्षण कराये है उसकी रिपोर्ट भी उत्साह जनक है। आगामी विस चुनाव में अभी की स्थिति में भाजपा 26 तथा 32 विधायकों में सिमट जाएगी यह सर्वे रिपोर्ट आई है। यह ठीक है कि 10 साल सरकार में रहने के बाद फिर से सरकार बनाना कठिन होता है। वैसे भी भाजपा में नरेन्द्र मोदी ही तीन बार लगातार जीत चुके है पर गुजरात की बात और है। खैर कांग्रेस का खेमा उत्साहित है पर कांग्रेस की गुटबाजी किसी से छिपी नहीं है। चर्चा तो अभी से शुरु हो ई है कि कुछ विधायकों की टिकट इस बार भी काटी जा सकती है। वैसे आरक्षण के विषय में राज्य सरकार की घोषणा और बाद में उच्च न्यायालय से स्थगन के बाद आदिवासी और सतनामी वर्ग राज्य सरकार से कुछ नाराज बताया जा रहा है इस वर्ग के मंत्री भी नाराजगी दूर करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं इसलिये मुख्यमंत्री ने इन वर्गों को संतुष्ट करने स्वयं कमान सम्हाल ली है। दरअसल सत्ता और संगठन के बीच तालमेल नहीं होने के कारण ही कुछ पार्टी नेता नाराज भी बताये जा रहे हैं। नौकरशाह बेलगाम होने के कारण पार्टी के विधायक सहित कुछ अन्य नेता शिकायत करते रहते हैं हर बार उन्हें संतुष्ट करने का आश्वासन दिया जाता है पर हालात जस के तस हैं।
कांग्रेस की हालत
केन्द्र में सबसे बड़ी पार्टी तथा यूपीए की प्रमुख घटक होकर सत्ता सम्हालने वाली कांग्रेस की हालात छत्तीसगढ़ में ठीक -ठाक तो वही कही जा सकती है। कभी छत्तीसगढ़ से निर्वाचित कांग्रेस की विधायक संख्या के आधार पर अविभाजित मप्र में कांग्रेस की सरकार बनती थी पर पिछले दो चुनावों में कांग्रेस की हालात पतली है कभी आदिवासी और सतनामी मतदाता कांग्रेस के करीब थे पर धीरे-धीरे उनकी दूरियां बढ़ती रही। बस्तर में कभी जनसंघ या भाजपा कोई नाम लेवा नहीं था। एकाध विधायक ही जीत पाते थे वहां भाजपा की स्थिति बेहतर होती गई है। 2003 के विस चुनाव में 11 में 2 पर कांग्रेस का कब्जा रहा तो यह संख्या 2008 के विस चुनाव में एक पहुंच गई है। सतनामी बाहुल्य क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति जरूर कुछ बेहतर है पर संतोष जनक नहीं कही जा सकती है।  कांग्रेस में कई खेमे हैं। अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल, डा. चरणदास महंत का खेमा अलग अलग है तो प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे भी अपना खेमा बनाने प्रयासरत हैं। खेमेबाजी के चलते कांग्रेस को पिछले दो विस-लोस चुनावों में नुकसान हुआ है। पिछले दो लोस चुनाव में कांग्रेस से एक-एक सांसद चुना जा रहा है। कांग्रेस में वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री विधायक आजकल उपेक्षित महसूस कर रहे है उनसे सलाह की बात तो दूर पार्टी की बैठकों में भी आमंत्रित नहीं किया जाता है और उपेक्षा का दौर जारी है। देखना यह है कि कांग्रेस कुछ सबक लेती है या नहीं।
पैसे के लिये मंत्री दर्जा छोड़ा
पिछले विधानसभा चुनाव में चर्चा में रहे मंत्री अजय चंद्राकर को कांग्रेस के पहलीबार चुनाव में खड़े लेखराज से पराजित होना पड़ा पर अब वे पुन: सक्रिय हो गये हैं। भाजपा की नयी राजधानी में पार्टी कार्यालय बनाने का जिम्मा उन्हें ही दिया गयाहै और वे लगे है पार्टी का भव्य कार्यालय बनाने में।
डाला से प्रदेश में कभी कद्दावर मंत्री बनने का सफर अजय चंद्राकर ने कैसे पूरा किया है बात कुरूद क्षेत्र का बच्चा बच्चा जानता है। उनके डाला कहलाने की भी कई जनचर्चा है। बहरहाल पूर्व मंत्री की हैसियत से राजधानी में सरकारी बंगला मांगने के दबाव के चलते उन्हें वित्त आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। वित्त आयोग की रिपोर्ट ठीक-ठाक बने इसके लिये उनके गुरु तथा दुर्गा कालेज के प्राचार्य पूर्व अशोक पारख को सदस्य बनाया गया। अशोक पारख वित्त आयोग की रपट बनाने में लगे भी है। हाल ही में अजय चंद्राकर द्वारा वित्त आयोग के अध्यक्ष बतौर कैबिनेट मंत्री का दर्जा सरकार को लौटाने की जमकर चर्चा है। सूत्र कहते हैं कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा हने पर अजय चंद्राकर को बतौर वेतन 58-60 हजार रूपये मासिक प्राप्त होते जबकि वित्त आयोग के अधिनियम में अध्यक्ष को करीब सवा लाख मिलेगा। कैबिनेट मंत्री का दर्जा होने पर उनका वेतन सदस्य से भी कम हो जाता। बहरहाल अजय चंद्राकर ने प्रशासन प्रशासन विभाग को पत्र लिखकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा वापस लेने का आग्रह कर अपनी आय बढ़ाने का मार्ग ही चुना। वैसे भी अजय चंद्राकर को आय-व्यय के संतुलन का पुराना अच्छा अनुभव है।
मोहन-मूणत की मांग
सांसद तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस के जनदर्शन को अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। आम जनों के साथ कुछ कांग्रेसी नेता भी समस्याओं के समाधान के लिये बैस से मिल रहे हैं। हर शनिवार को आयोजित जनदर्शन में रमेश बैस के घर में 100 से 150 लोग औसत पहुंचकर अपनी समस्या रखते है। रमेश बैस समस्या सुनकर तत्काल निदान का प्रयास करते है। पिछले शनिवार को उन्होने छग सरकार के मंत्री रामविचार नेताम, अतिरिक्त मुख्य सचिव विवेक ढांड, पीएचई सचिव सहित राजधानी के एसएसपी दीपाशु काबरा से फोन पर चर्चा कर आवश्यक निर्देश दिये है। जनदर्शन में शामिल कुछ लोगों ने राजधानी के दो मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत के भी साथ में शामिल करने का सुझाव भी दिया और सांसद बैस ने इस प्रस्ताव को स्वीकृत कर लिया और अगले शनिवार को दोनों मंत्रियों को शामिल करने की भी बात की।
और अब बस
० पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की रोजा इफ्तार पार्टी में 16 विधायक पहुंचे..एक खबर। टिप्पणी...विधायकों के विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे और प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल कहां रह गये।
० एक उत्साही युवा नेता तथा मीडिया में सुर्खी बनने वाले आजकल छग सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के खिलाफ चुनाव लडऩे का सपना पाल रहे हैं। एक टिप्पणी...चेम्बर और विस चुनाव में बड़ा फर्क होता है।

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