Tuesday, June 19, 2012

सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी है भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
यहां किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर संभल सको तो चलो


कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर भावी प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल राहुल गांधी तक ने कांग्रेस की गुटबाजी पर सवाल उठाये है, गुटबाजी दूर करके एकजुट होने की अपील की है पर छत्तीसगढ़ कांग्रेस की हालत जस की तस है। दिल्ली में सोनिया गांधी की गुटबाजी समाप्त करने की अपील के बाद ही रायपुर के कांग्रेस भवन में कांग्रेस के बुजुर्ग नेता विद्याचरण शुक्ल ने प्रदेश में सक्षम आदिवासी नेता नहीं होने की बात करके एक नये विवाद को जन्म दे दिया है। अब यह भी तो सवाल उठ रहा है कि प्रदेश में ब्राह्मण नेता भी तो एक भी नहीं है जिसका जनाधार है। छत्तीसगढ़ में हालांकि नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे, विधायक अमितेष शुक्ला विधानसभा में प्रतिनिधित्व करते है पर उनके साथ कितना जनाधार है यह किसी से छिपा नहीं है।
हाल ही में राहुल गांधी ने राजधानी प्रवास पर वरिष्ठ कांग्रेसियों को गुटबाजी छोड़ने की हिदायत दी। राहुल छत्तीसगढ़ कांग्रेस की गुटबाजी से खफा है। छग में कौन वरिष्ठ नेता है इस पर कांग्रेस के नेता का कहना है कि प्रदेश में 7 वरिष्ठ नेता है। पूर्व मुख्यमंत्री तथा विधायक अजीत जोगी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा, केन्द्र में राज्य मंत्री डा. चरण दास महंत, राज्यसभा सदस्य मोहसिना किदवई, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविन्द नेताम तथा पूर्व सांसद परसराम भारद्वाज सतनामी समाज का प्रतिनिधित्व करते है ऐसा माना जाता है। अरविंद नेताम आदिवासी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वैसे कांग्रेस के सूबे तो 7 भागो में बटे है पर प्रदेश की राजनीति अजीत जोगी के इर्दगिर्द ही घूमती है। केन्द्रीय राज्य मंत्री बनने के बाद डा. चरणदास का भी एक गुट बनना शुरू हो गया है। विद्याचरण शुक्ल महासमुंद की अपनी परंपरागत लोस क्षेत्र महासमुंद से अजीत जोगी से हार चुके है तो अरविन्द नेताम स्वंय पराजित हो चुके है तो उनकी पुत्री पिछला विस चुनाव हार चुकी है। राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा तो पिछले 3 विस चुनाव में अपने पुत्र अरूण को ही नहीं जितवा सके हैं। परसराम भारद्वाज की हालत यह है कि उनका पुत्र भी विधानसभा चुनाव हार चुका है। छत्तीसगढ़ के एक मात्र सांसद डा. चरणदास महंत ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला को पराजित किया है पर उनक गृह क्षेत्र चांपा की विधानसभा सीट भाजपा की झोली में चली गई थी। जहां तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और रविन्द्र चौबे की हालत है तो उन्हें अभी भी प्रदेश स्तर का नेता स्वीकार नहीं किया गया है। रविन्द्र चौबे की लो प्रोफाईल राजनीति और नंदकुमार पटेल की बयानबाजी कांग्रेस को भारी ही पड़ रही है।
वैसे 2003 और 2008 के विस चुनाव में टिकट वितरण के बाद भाजपा की सरकार बनी पर कांग्रेस के कई दिग्गज तथा दिग्गजों के रिश्तेदार चुनाव हार गये यह ठीक है कि पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ कांग्रेस के चुनाव परिणाम बेहतर रहे पर सरकार बनाने में कांग्रेस सफल नहीं हो सकी। बस्तर में जहां विपक्षी दल को उम्मीदवार नहीं मिलते थे वहां कांग्रेस की स्थिति सोचनीय ही रही। खैर 2013 के विस चुनावों में अजीत जोगी के साथ डा. चरणदास महंत की भी निश्चित ही चलेगी। मोतीलाल वोरा, विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, रविन्द्र चौबे भी अपनी चलाने का प्रयास करेंगे। सवाल यह उठ रहा है कि 2003, 2008 के चुनाव परिणामों से कांग्रेस कुछ सबक लेगी या नहीं यही देखा जाना है।
भाजपा की हालत
भारतीय जनता पार्टी की हालत भी कुछ ठीक है ऐसा दावा तो भाजपा के नेता भी नहीं कर रहे है। कांग्रेस की तरह भाजपा की गुटबाजी भी चर्चा में है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह सबसे शक्तिशाली नेता है। विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा में प्रत्याशी चयन से लेकर उन्हें विजयी बनाने तक डा. रमन सिंह की भरपूर चली है। प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका फिलहाल रबर स्टेम्प की ही रही है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ताराचंद साहू पार्टी से बाहर है तो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार साय, शिव प्रताप सिंह, विष्णु देव साय हाशिये पर है। प्रदेश के वरिष्ठ सांसद रमेश बैस से लेकर दीलिप सिंह जूदेव पूर्व सांसद, करूणा शुक्ला की उपेक्षा किसी से छिपी नहीं है। समय समय पर इन नेताओं की बयानबाजी असंतोष उभारती है। हाल ही में जिस तरह आरक्षण के नाम पर प्रदेश में आदिवासियों और सतनामियों के बीच की राजनीति चली उससे आदिवासियों सहित सतनामी समाज आक्रोशित है। हाल ही में सतनामियों को सेट करने उन्हीं के समाज के भूषण जांगड़े को राज्यसभा भेजा गया तथा समाज के गुरु विजय कुमार को लालबत्ती दी गई पर सतनामी समाज के बीच इनका कितना जनाधार है यह किसी से छिपा नहीं है। विजय कुमार तो स्वयं आरंग से विस चुनाव हार चुके है और उनका पुत्र रूद्र गुरू वर्तमान में कांग्रेस से विधायक है। जहां तक भाजपा सरकार में गुटबाजी का सवाल है तो वरिष्ठ मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत तथा रामविचार नेताम के बीच का तनाव किसी से छिपा नहीं है। विरोध का मामला कई बार सार्वजनिक भी हो चुका है। कमल विहार योजना में यह मतभेद खुलकर सामने आ चुका है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और वरिष्ठ मंत्री ननकीराम कंवर के बीच का तनाव कई बार सामने आ चुका है। गृहमंत्री होने के बाद भी गृह विभाग की कमान मुख्यमंत्री के करीबी लोगों द्वारा ही सम्हालने से ननकीराम काफी आहत हैं। मंत्रिमंडल के कुछके मंत्री उनके विभागों में सीधे सीएमओ के दखल से भी परेशान है। कहा जा रहा है कि हाल ही में अजजा और अजा के आरक्षण का प्रतिशत घटाने बढ़ाने को लेकर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों को विश्वास में नहीं लिया गया है इसको लेकर भी कुछ नाराजगी है।
यह बात और है कि कांग्रेस के बड़े नेता मुंहफट है और कही भी टिप्पणी कर देते है पर भाजपा के नेता खुलकर टिप्पणी करने से जरूर बचते है पर असंतोष कभी कभी मुखर हो जाता है। सांसद दीलिप सिंह जूदेव द्वारा प्रशासनिक आतंकवाद का आरोप सरकार पर मढ़ा जा चुका है, रमेश बैस भी अपनी उपेक्षा की पीड़ा कभी -कभी सार्वजनिक कर ही देते है तो वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय आदिवासी एक्सप्रेस पहले चला चुके है आजकल आदिवासी राष्ट्रपति की मुहिम में लगे है। हाल ही में नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) सुषमा स्वराज से भी करूणा शुक्ला ने अकेले में बातचीत कर अपनी पीड़ा का बखाना कर चुकी है।
बसपा, माकपा, अन्य
छत्तीसगढ़ में कुछ क्षेत्रों में बसपा की अच्छी पकड़ है। वैसे तो अभी विधासनभा में बसपा का एक निर्वाचित विधायक है पर बिलासपुर,जांजगीर, रायगढ़ पट्टी में बसपा का अच्छा जनाधार है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मप्र और छत्तीसगढ़ एक राज्य होने पर 1998 के विधानसभा चुनावों में सीपत, पामगढ़ से बसपा का विधायक चुना गया था तो 1990, 93 तथा 98 में बसपा के दाऊराम रत्नाकर लगातार पामगढ़ विधानसभा से विजयी होते रहे है। वहीं मालखरौदा में 1993 में बसपा प्रत्याशी करीब 2 हजार मतो से पराजित हुआ था। वही तानाखार विधानसभा 90,93 के चुनाव में गोडवाना गणतंत्र पार्टी के प्रत्याशी दूसरे नंबर पर था इधर तो 96 के उपचुनाव तथा 98 के चुनाव में अपनी जीत दर्ज कर चुका है। बस्तरम ें भाकपा का अच्छा जनाधार है इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। कोटा में 85 विस चुनाव में भाकपा दूसरे नंबर पर रही तो 90,93 में भाकपा का विधायक बना, 98 के चुनाव में भी भाकपा दूसरे नंबर पर रही इधर 98 के विस चुनाव में मारो से भी एक निर्दलीय डेरहू प्रसाद धृतलहरे विजयी हो चुके है फिलहाल वे छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच में है। 90 के विस चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा के जनकलाल ठाकुर दूसरे नंबर पर रहे थे 93 में विधायक बने और 98 में पुन: दूसरे स्थान पर रहे। इधर 90-93 में भाजपा से विधायक और 91,96, 98 तथा 99 में दुर्ग से ही सांसद बने ताराचंद साहू भाजपा से अलग होकर छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के बेनर तले चुनाव लड़ा रहे है यह बात और है कि उनके मंच का अभी तक विधानसभा में खाता नहीं खुला है। बहरहाल कांग्रेस और भाजपा के असंतोष, टिकट नहीं मिलने पर बगावत कर मैदान में उतरने वाले कुछ नेता तथा अन्य लोग यदि 2013 के चुनाव में मजबूत होकर उभरते है तो सरकार विस पार्टी की बनेगी यह तय करने की स्थिति में भी हो सकते हैं. वैसे आदिवासियों, सतनामियों के असंतोष का लाभ जो ले सकेगा वही सफल होगा।
और अब बस
0 पापा मैं ठेकेदारी करूंगा।
पापा...तू क्या खाकर ठेकेदारी करेगा?
बेटा, ठेकेदारी खाकर नहीं,
खिलाकर की जाती है।
0 राजधानी के कुछ क्षेत्रों में कई वर्षों से चर्चित नड्डा आजकल भाजपा सरकार और नेताओं के बीच प्रभावशाली हो गया है।

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